
देख ले दुनिया, आँख के अंधे।
ग़र फिर तुझको मरना है तो करले प्यार धर्म से बन्दे।
मज़हब की चक्की में पिसकर होली, ईद शहीद हो गई।
जाति की कड़वी दवा भी अब तो, भारत में मुफ़ीद हो गई।
लोगों को ये दवा पिलाकर, तुम भी करले वोट के धंधे।
देख ले दुनिया, आँख के अंधे।
पांच दशक से जिस खाई को पाट रहे थे हम हँस -हँसकर।
वह तो अब तालाब बन गई, नेताओं की चाल में फँसकर।
कोशिश करले जाल फेंककर, निकल आए शायद हथकंडे।
देख ले दुनिया, आँख के अंधे।
चोरी, हत्या, ग़बन घोटाला ये सब छोटे जुर्म हैं लाला।
ग़र तुझको धनवान है बनना, ले जा बैंक से खोल के ताला।
लेकिन, इतना करते जाना, दे आना दरबार में चंदे।
देख ले दुनिया, आँख के अंधे।
अंत में इतना मेरी सुनले, दुःख मत देना किसी व्यथित को।
उसकी आह कठिन है पगले, राह तू देना सदा कथित को।
शांति से तुझको जीना है, तो छोड़ दे ये सब गोरख़ धंधे।
देख ले दुनिया, आँख के अंधे।
-शम्भुनाथ पाण्डेय ‘व्यथित’


