
तेल व्यापार से आगे की सोच है सऊदी अरब की!
मिथिलेश कुमार सिंह
बीते दिनों में वैश्विक सम्बन्धों में काफी बदलाव देखने को मिले हैं। खासकर ईरान पर से तमाम आर्थिक प्रतिबन्ध हटा लेने के पश्चात सऊदी अरब के माथे पर बल पडऩा स्वाभाविक ही हैं क्योंकि कच्चे तेल के क्षेत्र में प्रतियोगिता और बढऩे ही वाली हैं। कहा जा सकता है कि सऊदी अरब के आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा होने का मुख्य कारण है बीते दशक में काफी लंबे समय से चले आ रहे कच्चे तेल के दामों का लगातार घटना। गौर तलब है कि काला सोना के नाम से मशहूर कच्चे तेल पर ही यहां की पूरी आर्थिक स्थिति पर निर्भर है।
तेलों के दाम में गिरावट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस तेल का दाम जून 2014 में 100 डालर बैरल था, आज उसकी कीमत मात्र 39 डालर बैरल है यानी 2 साल में तेल की कीमत धड़ाम हो गयी है। जाहिर है, अगर आपके पास आमदनी के स्रोत घटेंगे तो विभिन्न मदों में जाने वाले खर्चों पर भी आपको नियंत्रण करना ही होगा और सऊदी अरब ने भी अपने कई तरह के भारी भरकम बजट को कम किया है अथवा उसे ऐसा करने के लिए विवश होना पड़ा है। इकोनॉमिक्स एनालिस्ट रैचेल जेम्बिया के अनुसार सऊदी अरब को फाइनेंशियल रिजर्व से हर महीने 10 से 15 बिलियन डालर नुकसान भी उठाना पड़ रहा है जिसकी वजह से उसके पास अब सिर्फ और सिर्फ 600 अरब डालर का फाइनेंशियल रिजर्व शेष रह गया है।
जाहिर है, इन हालातों से निबटने के लिए कुछ न कुछ कदम तो उठाये ही जाने थे और इसी को लेकर सऊदी प्रशासन ने नयी दृष्टि पेश करने की कोशिश की है। हालाँकि, यह विजन किस हद तक ग्राउंड पर फलीभूत होगा, और इसके क्या साइड इफेक्ट सामने आएंगे, यह जरूर देखने वाली बात होगी। कहा जा सकता है कि इस तरह की आर्थिक हालत से निकलने के लिए सऊदी अरब ने पेश किया है सऊदी विजन 2030 । सऊदी विजन 2030 का मुख्य मकसद देश को तेल की निर्भरता से काफी हद तक मुक्ति दिलाना है जिससे इस खाड़ी देश की अर्थव्यवस्था तेल के दाम काम होने की स्थिति में डगमगाने न लगे। इस कवायद के लिए सऊदी के तेल की सबसे बड़ी कंपनी अरामको के 5 प्रतिशत शेयर को बेचने की तैयारी की गयी है।
तेल के इन शेयरों से जो पैसा मिलेगा, उसको जमा करके दुनिया का सबसे बड़ा सावरेन वेल्थ फंड बनाने के साथ नानॉआयल रेवेन्यू को इकठ्ठा करना प्रमुख उद्देश्य बताया गया है। जाहिर है यह एक बेहद महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है और आने वाले समय के लिए एक दूरदृष्टि भी। इसके लिए सऊदी अरब के डिप्टी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड (पीआईएफ) पर जोर दिया है जो तेल पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता को खत्म करने में मदद कर सकता है। इस संबंध में ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट को देखें तो पीआईएफ लगभग 2 लाख करोड़ डालर से ज्यादा का होने का अनुमान है और यह इतनी बड़ी रकम है, जो एप्पल, गूगल की कंपनी अल्फाबेट, माईक्रोसॉफ्ट और बर्कशायर हैथवे जैसी कंपनियों को खरीदने के लिए काफी है। एक और अनुमान के अनुसार, अभी तक दुनिया में इससे बड़ा कोई आईपीओ नहीं है। जाहिर है कि आने वाले समय की जरूरतों के लिहाज से इस तरह के प्रोजेक्ट्स को परवान चढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं ताकि किसी भी तरह के झटके से सऊदी अर्थव्यवस्था अप्रभावित रहे।
मिली जानकारी के अनुसार, इस जमा किये गए फण्ड का मुख्यालय किंग अब्दुल्लाह की फिनांसियल डिस्ट्रिक्ट में होगा और इसके तहत सरकारी संपत्तियों को भी होल्ड किया जा सकता है तो भूमि को विकसित करने के लिए भी सरकार तमाम कदम उठा सकती है, जिसके लिए अलग अलग कंपनियों को ठेका देने की भी तैयारी चल रही है। सऊदी अरब प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के अनुसार, आयल कंपनी को इस तरह के प्रोसीजर से एक बड़ी इंडस्ट्री में बदला जा सकता है जो अंतत: तेल पर निर्भरता को कम करेगा। इसके लिए अगले साल तक कंपनी का आईपीओ भी सामने आ सकता है।
एक साक्षात्कार में प्रिंस ने यह भी कहा कि अरामको कंपनी का आईपीओ और शेयर्स को पीआईएफ में ट्रांसफर करना तकनीकी रूप से सऊदी सरकार का रेवेन्यू सोर्स होगा, न कि तेल पर इन्वेस्टमेंट। सऊदी प्रशासन की जो योजना है, उसके अनुसार इस बड़े इन्वेस्टमेंट को कई तरह से इस्तेमाल किया जायेगा जिससे कि आने वाले 20 साल में तेल पर आर्थिक निर्भरता न के बराबर हो जाये।
अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की कड़ी में, सऊदी अरब अपने मिलिट्री के खर्चों को भी कम करने की सोच रहा है और इसके लिए आधे मिलिट्री के उपकरणों को अपने देश में ही तैयार करने की रणनीति पर यह खाड़ी देश गम्भीरता से विचार कर रहा है। हालाँकि, कथनी और करनी में बड़ा फर्क होता है और जब तक योजनाएं जमीन पर लागू न की जाएँ, तब तक कुछ भी कहना अत्यन्त कठिन कार्य है। तमाम वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं ने अपने प्रारूप और स्वरुप बदल लिए हैं तो क्षेत्र में दबदबा रखने के लिए केवल तेल के सहारे आगे बढऩे की रणनीति को बदलना सऊदी अरब की मजबूरी ही कही जा सकती है।
आर्थिक विश्लेषक इस मामले में कोई आंकलन देने की जल्दबाजी से बचना चाह रहे होंगे क्योंकि जो देश दशकों से तेल के दम पर अपना राज कायम रखे हुए है और उसके तेल का हिस्सा एशिया में लगभग 70 प्रतिशत तो अमेरिका में 20 प्रतिशत और यूरोप में 10 प्रतिशत जाता हो, वह अचानक तो ऐसा नहीं ही कर सकेगा हालाँकि तेल के क्षेत्र में ईरान के खुलकर आ जाने से परिस्थितियों में बदलाव अवश्यम्भावी ही था और यह बात सऊदी प्रशासन बखूबी समझ चुका है।


