धर्म, जाति और आतंक

 

लेखक : संकेत यादव 

 

धर्म, जाति और आतंक का चोली-दामन का-सा रिश्ता होता है। प्रख्यात यहूदी विचारक कार्ल मार्क्स ने भी धर्म की तुलना अफीम से की थी। धर्म के नाम पर जनता को बरगलाना बहुत आसान होता है। धर्म के नाम पर निठल्ले और कामचोर अपनी दुकान चलाते हैं तो वहीं राजनीतिज्ञ लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। धर्म आज वह कामधेनु बन चुका है जिसे जब चाहें तब दुहा जा सकता है। दरअसल, धर्म एक धंधा बन चुका है। इस धंधे पर आर्थिक मंदी और तेजी का कुछ भी असर नहीं पड़ता है। यह अबाध गति से चलते रहने वाला बुराई की बुनियाद पर खड़ा एक उद्योग धंधा है। जिस पर एक विशेष वर्ग का कब्जा हजारों साल से बना हुआ है। या यूँ कहें कि उन्हें शाश्वत आरक्षण प्राप्त है। जो उन्हें जन्मजात प्राप्त है। मजेदार बात तो यह है कि यह उल्टे मंदी, भुखमरी, बेरोजगारी तथा दुनिया की अर्थव्यवस्था जब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी होती है तो इस धंधे में और तेजी आ जाती है। मतलब यह धंधा बहुत ही उम्दा है। स्वर्ग का ख्वाब और नर्क का भय दिखाकर अंधभक्तों की ऐसी की तैसी कर देने में धर्म की अहम भूमिका रही है। यही एक ऐसा धंधा है जिसमें लोग हँसी-ख़ुशी से अपनी जेब कटवाकर मुस्कराते हुए घर चले आते हैं।

 

अन्धविश्वास और अज्ञान युक्त यह धर्म समाज और राष्ट्र की आर्थिक, वैज्ञानिक तथा समग्र उन्नति के मार्ग में एक बहुत बड़ा बाधक तथा घातक होता है। जितने लोग अब तक किन्हीं प्राकृतिक आपदाओं से नहीं मरे हैं, कहीं उससे ज्यादा, कई गुना लोग धर्म के नाम पर या तो मरे हैं या मारे गए हैं। इतिहास आज भी इस बात का गवाह है। धर्मांधता एक वैश्विक समस्या है तो वहीं जातिवाद भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक भयंकर मानव निर्मित आपदा है जिसका दंश इस देश का मूलनिवासी सहस्रों वर्ष से चुपचाप झेल रहा है अपने पूर्व जन्मों का फल समझकर। जातिवाद ने भारतीय समाज को इस कदर बाँट रखा है कि कोई भी एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाता है। जातिवाद जहाँ एक तरफ मुट्ठीभर एक विशेष वर्ग के लोगों के मनोबल को ऊँचा रखता है तो वहीँ दूसरी तरफ इस देश के बहुसंख्यक मूलनिवासियों के मनोबल को गिराकर मानसिक रूप से विकलांग बना देता है। दरअसल, जातिगत ऊंच-नीच की भावनाओं से ग्रस्त लोगों की मानवीय संवेदनाएं ही मर चुकी हैं। आज समाज में हो रहे उथल-पुथल का मुख्य कारण धर्म, जाति की गलत व्याख्या तथा उससे उत्पन्न आपसी वैमनस्य ही आतंकवाद तथा नक्सलवाद के रूप में समाज को लहूलुहान कर रहा है। नफरत की आग में जल रहा समाज  पूरी दुनिया को आज विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है 

 

यह बड़ी अजीब बात है कि जातिगत आधार पर ही लोगों की योग्यताओं का आकलन किया जाता है जो सर्वथा गलत और असंवैधानिक भी है। स्वयं घोषित उच्च जाति के लोग अपने को काबिल तो दूसरों को नाकाबिल समझते हैं। उच्चवर्णीय लोग राज-काज व समाज पर अपना प्रभुत्व जताते हुए राष्ट्रिय संपत्ति को अपनी बपौती समझते हैं तो वहीं राष्ट्र के स्तंभ निम्नवर्णीय लोगों को सभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित करके जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर कर देते हैं। क्या इसे ही सही मायने में इंसानियत कहा जा सकता है? राज-काज, समाज और संपत्ति पर सबका समान अधिकार होना चाहिए यही हमारा पवित्र संविधान भी कहता है। जब तक इस देश में समतामूलक समाज की स्थापना नहीं होगी तथा सबके लिए समान शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा न्याय की व्यवस्था नहीं की जायेगी, भेद-भाव रहित सबको समान अवसर उपलब्ध नहीं कराये जायेंगे तब तक इस देश को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाना शेखचिल्ली के सपने जैसा ही होगा। विघटनकारी तथा सांप्रदायिक शक्तियाँ मीडिया की मेहरबानी से इस देश को विश्वगुरु तो बना देंगी पर एक खुशहाल भारत का निर्माण कभी नहीं कर पाएंगी।

जारी है ………..

जातिगत आधार पर भारतवर्ष की किन-किन महान विभूतियों को अपमानित होना पड़ा है, अगले अंक में पढ़ना न भूलें।

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