भ्रष्टाचार पर बने आयोग फेल क्यों हैं

Moral-awareness

नरेंद्र देवांगन

भ्रष्टाचार वह शब्द है जिससे आज हमारे देश का बच्चा-बच्चा भलीभांति परिचित है क्योंकि आज हर व्यक्ति खुद को संपन्नता और शोहरत के शिखर पर देखना चाहता है और अपने इस सपने को सच करने के लिए वह किसी भी प्रकार के गलत तरीके को अपनाने से नहीं हिचकता और इन्हीं गलत कार्यों से भ्रष्टाचार फैलता है जो आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था और पहचान को दीमक की तरह खत्म कर रहा है।

हर साल हमारे देश मेें भ्रष्टाचार और घोटालों के कई मामले प्रकाश में आते हैं और उनमें देश के कई सम्मानित और सफेदपोश लोगों के नाम शामिल होते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा आज हर भारतीय के होंठों पर मौजूद है। अन्य देशों की तुलना में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भारत पिछड़ता जा रहा है। यह स्थिति तब है जब भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही के लिए तमाम कानून व एजेंसियां मौजूद हैं।

ऐसे मामलों में दोषियों को सजा देने के लिए सरकार जांच आयोगों का गठन तो करती है पर वे जांच आयोग अगर सही और सुचारू रूप से काम करें, तभी तो दोषियों को सजा मिलेगी। प्रसिद्ध और शक्तिशाली व्यक्तियों के शामिल होने से यह भी प्रश्न उठता है कि अगर वे व्यक्ति दोषी हैं भी तो क्या प्रमाण है कि उन्हें जो सजा मिलेगी, वह कठोर होगी? समस्या इन कानूनों का सख्ती से लागू करने और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को ज्यादा मजबूत बनाने की है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत में नोडल एजेंसी केंद्रीय सतर्कता आयोग(सीवीसी) के दांत सिर्फ दिखाने के लिए हैं। वह केवल भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की सिफारिश कर सकता है। यह हास्यास्पद तथ्य है कि विभिन्न मंत्रालयों एवं 1500 से भी ज्यादा विभागों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करने के लिए इसके पास मात्र 200 सदस्य हैं।

सीवीसी की हैसियत मात्र एक सलाहकारी निकाय की है। इसके पास आपराधिक मामले दर्ज करने का, राजनेताओं व संयुक्त सचिवों पर कार्यवाही करने का अथवा सीबीआई से फाइल मंगाने तक का भी अधिकार नहीं है। वहीं सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की हालत यह है कि अपने गठन से ले कर आज तक वह दो-चार नेताओं को छोड़ कर किसी भी बड़े राजनेता को सजा तक नहीं दिलवा सकी है।

सीबीआई मात्र कहने को स्वतंत्र है लेकिन है पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में। कोई भी जांच शुरू करने से पहले या किसी अधिकारी और नेता के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उसे एक ऐसी सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है जो उन्हीं नेताओं व अन्य लोगों के समर्थन पर टिकी है जिनके खिलाफ जांच करनी है। ऐसे में यह आशा करना कि सरकार स्वतंत्र जांच का आदेश देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करेगी, एक कपोल कल्पना है।

हर विभाग में गठित विजिलेंस विंग की कार्यशैली भी विवादास्पद है। कई बार ऐसे अधिकारी को विजिलैंस का कार्यभार दिया जाता है जो किसी न किसी आपराधिक मामले में आरोपी है। ऐसी स्थिति में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह अपने या अपने जैसों के ही खिलाफ कार्यवाही का आदेश पारित करेगा।

समस्याओं के इस चक्र व्यूह में यह सवाल बार-बार उठता है कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के तमाम सुबूतों के बावजूद ये आयोग दोषियों को सजा क्यों नहीं दिला पाते? कारण स्पष्ट है कि आज हर भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र समझौतावादी माहौल में काम कर रहा है। सभी भ्रष्टाचार निरोधक आयोगों के आयुक्त व सदस्यों की नियुक्ति राजनेताओं के नियंत्रण में है। जाहिर है कि कोई भी अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगा। इन आयोगों का स्वतंत्र न होना ही इनकी निष्क्रियता का मूल कारण है। फिर भी कहीं न कहीं यह भी एक कारण है कि इन आयोगों में इच्छाशक्ति की घोर कमी है।

सरकारी शिथिलता व कमजोर नीतियों ने भी इन आयोगों को पंगु बना दिया है। सीमित अधिकारों व राजनीतिक चोंचलों ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। भ्रष्टाचार की बुनियाद को खोखला करने और भ्रष्टाचार की नई आशंकाओं से पार पाने के लिए मौजूद संस्थाओं की हालत बिना पंखों वाले उस पक्षी की तरह है जो केवल आसमान की ओर देख सकता है लेकिन उड़ नहीं सकता। भ्रष्टाचार की नित नई उघड़ती परतों से लोहा लेने के लिए गठित ये आयोग सत्ताधारी राजनेताओं के समक्ष बौने हैं।

इस तरह सरकार के स्वार्थ ने भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए बने आयोगों को ऐसा बूढ़ा शेर बना दिया है जो सिर्फ गुर्रा सकता है, चल फिर नहीं सकता, शिकार भी नहीं कर सकता, बस इतना गुमान कर सकता है कि बूढ़ा हुआ तो क्या हुआ, है तो वह शेर। भ्रष्टाचार के ऐसे मामलों में जिनमें बाहुबली और प्रभावशाली व्यक्ति लिप्त हों, उनमें जांच आयोग भी लाचार और असमर्थ भूमिका निभाते हैं।

भ्रष्टाचार से निबटने के लिए बने ये आयोग खुद भ्रष्ट अधिकारियों के साए में दबे हैं। सतर्कता आयोग में अध्यक्ष रहे पी.जे. थामस का मामला सर्वविदित है। अत: वक्त का तकाजा है कि ये आयोग अपनी हालत पर गौर करें और कम से कम ईमानदारी के खिलाफ जंग का अदम्य साहस जुटाएं। राज्य व केंद्र सरकार भी इस तरह की समितियों को अधिकार व संसाधन से संपन्न करने के लिए कारगर कदम उठाए।

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