भ्रामक विज्ञापन: सरकार, कंज्यूमर कोर्ट और उपभोक्ता

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चांद खां रहमानी

संभवत: देश में पहली बार किसी सरकारी समिति ने उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए कुछ बेहतरीन लेकिन कड़े सुझावों को अमल में लाने की सिफारिश की है। उपभोक्ता संरक्षण विधेयक में सुधार की सलाह देते हुए संसद की खाद्य उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण पर बनी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार से भ्रामक विज्ञापन करने वाले नामचीन सेलेब्रिटीस के खिलाफ कड़े कानून बनाने की सिफारिश की है।

शायद यह पहला मौका है जब किसी उत्पाद का विज्ञापन करने वाले कलाकारों और मशहूर हस्तियों को भ्रामक विज्ञापन करने पर सजा की सिफारिश की गई है। समिति ने सिफारिश करते हुए कहा है कि अगर मशहूर हस्तियां पहली बार भ्रामक विज्ञापन करने की अपराधी पाई जाती हैं तो उन पर दस लाख रुपए का जुर्माना या एक साल की जेल की सजा होनी चाहिए।

दूसरी बार भ्रामक विज्ञापन करने का दोषी पाए जाने पर पचास लाख रुपए का जुर्माना और पांच साल की जेल होनी चाहिए। समिति ने सरकार से कहा कि खाद्य उत्पाद की गलत व्याख्या को गंभीरता से लेना चाहिए। समिति ने कहा कि वर्तमान समय में भ्रामक विज्ञापन करने को लेकर कड़े नियम नहीं हैं जिनका कंपनियां और सेलेब्रिटी दोनों लाभ उठाते हैं। समिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि कंपनियां अपने उत्पाद बेचने के लिए मशहूर हस्तियों को उत्पाद का अंबेसडर बनाती हैं। इन हस्तियों के दावों पर लोग आंख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं जबकि वास्तव में ज्यादातर विज्ञापन पूरी तरह भ्रामक होते हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता है। इस तरह उपभोक्ता ठगी का शिकार होते रहते हैं।

यह ठगी कोई चोरी छिपे नहीं होती बल्कि सरकार के सामने होती है लेकिन सरकार यह सब होते देखती रहती है। यह कितना दुखद है कि उपभोक्ता भ्रामक विज्ञापनों, सरकार और कंज्यूमर कोर्ट के बीच खुद को फंसा पाता है। दिखावे के लिए भले ही उपभोक्ता के हितों की बात कही जाती हो लेकिन सच्चाई यह है कि उसके हित में कोई नहीं है। अगर ऐसा होता तो आज लाखों केस कंज्यूमर कोर्ट (उपभोक्ता फोरम) में विचाराधीन नहीं होते। कंपनियां को डर होता तो वह न तो भ्रामक विज्ञापन दिखाते और न झूठे दावे करते लेकिन यह सब हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले उपभोक्ताओं के हितों के लिए कुछ नहीं किया गया। इससे पहले 2005 में उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए कंज्यूमर फोरम की स्थापना की गई। इस फोरम में उपभोक्ताओं को यह सहूलियत दी गई कि वे खराब, घटिया उत्पाद, सेवा में कमी, ठगी आदि की शिकायत अपनी भाषा में कर सकें। इन उपभोक्ता फोरम में हाईकोर्ट के अनुभवी अवकाश प्राप्त जजों को नियुक्त किया गया जो उपभोक्ता के हितों की रक्षा कर सकें। शुरू -शुरू में इन फोरम के पास न्याययिक शक्तियां नहीं थीं जिससे मनमानी करने वाली कंपनियों, दुकानदारों, ठगी करने वालों पर बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ। जब फोरम के पास न्यायिक शक्तियां आईं तो कुछ हद तक उपभोक्ताओं को राहत मिली।

लेकिन उपभोक्ता अदालतों (फोरम) में इस बात का प्रावधान नहीं रखा गया कि भ्रामक विज्ञापन करने वालों को भी सजा मिले। यह पहली बार है जब किसी समिति ने ग्राहक को झूठे दावे कर ललचाने वाले कलाकारों, मशहूर हस्तियों को सजा दिलाने की सिफारिश की है। इसलिए यह सिफारिश ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। उपभोक्ता फोरम से लोगों को शुरू-शुरू में कुछ हद तक राहत मिली लेकिन बाद में इन फोरमों का लाभ मिलना बहुत कम हो गया। इसके पीछे कई कारण थे।
सरकार ने उपभोक्ता अदालतें बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली और उपभोक्ताओं को पहले जैसा हालात में ही छोड़ दिया, यानी ठगने वाली, घटिया माल बनाने वाली कंपनियों और सेवा में कमी करने वालों को अघोषित रूप से छूट दे दी गई। उधर सरकार लोगों को ठगों से बचने, घटिया और मिलावटी माल न खरीदने के लिए भी जागरूक करती रही। यह विरोधाभास है कि एक तरफ सरकार उपभोक्ताओं को जागरूक करे और दूसरी तरफ ठगी करने वाली कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई न की जाए।

जब सरकार ने उपभोक्ता फोरमों का गठन किया था उस समय यह तय किया गया था कि उपभोक्ता को अधिकतम तीन महीने में न्याय मिल जाए। कुछ समय तक इसका लोगों को लाभ मिला भी लेकिन अब हालात बहुत बदतर हैं क्योंकि इस समय इन अदालतों पर विवादों का बहुत बोझ है। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 उपभोक्ता फोरम में लगभग चार लाख केस लंबित थे। इन दो साल में यह संख्या निश्चित रूप से बहुत बढ़ी होगी। इससे पीडि़तों को जल्दी न्याय नहीं मिल पा रहा।

अब फोरम की हालत यह है कि आम अदालतों की तरह एक मामले की सुनवाई सालों होती है। यह उपभोक्ता के लिए निराशा और ठगी करने वाली तथा घटिया माल बेचने वालों के लिए खुशी की बात है। देर से न्याय मिलने के कारण उपभोक्ता के हौसले पस्त हो जाते हैं जिससे वह हार थक कर घर बैठ जाता है। इससे कंपनियों के हौसले बुलंद होते हैं क्योंकि वे यही तो चाहते हैं कि उपभोक्ता थक हार कर घर बैठ जाए। इसका प्रभाव यह पड़ा कि जागरूक उपभोक्ता भी लम्बे समय तक न्याय न मिलने के कारण ठगी का शिकार होने बाद भी फोरम में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उसे लगता है कि बस उसे तारीख पर तारीख मिलती रहेगी।

ऐसी हालत में यह जरूरी है कि स्थितियां ऐसी बनाई जाए कि उपभोक्ता को अदालत का दरवाजा खटखटाना ही न पड़े। इस राह में समिति का यह कदम निस्संदेह ही सरहनीय है। कम से कम इससे लोग सेलिब्रीटीज के झांसे में तो नहीं आएंगे। यह बात अलग है कि सरकार समिति की इस रिपोर्ट को कब लागू करेगी लेकिन यह तय है कि अगर ऐसा होता है तो उपभोक्ता ठगी से बहुत हद तक बच जाएगा।

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