
रहस्य हीरों की चोरी का
राजेन्द्र ‘राजपूत’
हारटन गार्डन लंदन का हीरों का प्रसिद्ध बाजार है। इस बाजार में से विश्व का कीमती से कीमती हीरा प्राप्त किया जा सकता है। केवल एक दुकान पर करोड़ों के ही नहीं बल्कि अरबों पौण्ड के हीरे मौजूद रहते हैं। यह लंदन का सबसे कीमती तथा सुन्दर बाजार है।
इसमें बिकने वाले बहुमूल्य और दुर्लभ हीरों की सुरक्षा का प्रबंध भी उतना ही जबरदस्त है किंतु इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद भी उस बाजार में से अचानक हीरे गायब होने लगे। यूं लगता था कि जैसे लंदन पुलिस स्टेशन के अधिकारी ही हीरों की चोरी करवा रहे हैं क्योंकि वे जानबूझ कर लाखों पौण्ड के हीरों की चोरी पर पर्दा डाल रहे थे किंतु क्या सच्चाई यही थी? क्या सचमुच ही पुलिस अधिकारी इस चोरी में शामिल थे?
हारटन गार्डन बाजार के हीरों की चोरी का यह भेद गहरा होता जा रहा था। आखिर इस रहस्यपूर्ण चोरी के पीछे किसका हाथ था। यह चोरी इस लिए और भी सनसनीखेज बनती जा रही थी, कि उस बाजार में असाधारण सुरक्षा का प्रबंध था और वहां से चोरी करना असंभव था किंतु मैंने इस पहेली को हल कर ही दिया।
मैं स्काटलैंड यार्ड के विशेष जांच पड़ताल का एक बड़ा अधिकारी हूं। मुझे बताया गया कि हारटन गार्डन बाजार में हीरों की यह हैरानी भरी चोरी एक बार नहीं बल्कि 24 बार हुई है। चौबीस बार कीमती हीरों की थैलियां गायब हुई हैं और हीरों के व्यापारी हैरानी और खेद से हाथ मलते रहे। ये थैलियां विश्व की सुरक्षित तिजोरियों में से गायब हो रही थीं। उसको चोरी भी नहीं कहा जा सकता था, डाके का नाम भी उसको नहीं दे सकते थे क्योंकि चोरी और डाके का कोई भी चिन्ह मौजूद नहीं था। बस अचानक सुरक्षित तिजोरियों में से कुछ थैलियां गायब हो गई थीं।
मैं एक अन्य केस की जांच पड़ताल के लिए लंदन से बाहर गया हुआ था कि मुझे स्काटलैंड यार्ड पहुंचने का आदेश मिला। मुझे डिप्टी कमिश्नर के सामने जा कर हाजरी देनी थी। मैं जब वहां पहुंचा तो फ्लाइंग स्क्वैड के चीफ और दूसरे बड़े अधिकारी वहां उपस्थित थे। मुझे कहा गया कि मैं बिना बताये छिपकर लंदन पुलिस स्टेशन जाऊं और वहां से वह रजिस्टर उठा लाऊं जिसमें अपराधों की सूची होती है तथा किसी को भी इस घटना के बारे में बताये बिना ही वापिस स्काटलैंड यार्ड आ जाऊं।
लंदन पुलिस स्टेशन का इन्चार्ज मेरा परिचित व मित्र था। उसकी सहायता से मैंने अपराधों के रजिस्टर की जांच की। मुझे उसमें हीरों की चोरी की एक भी दुर्घटना की रिपोर्ट नहीं मिली जिस से प्रकट होता था कि पुलिस सचमुच ही पर्दा डाल रही है किंतु अचानक मुझे एक बात का पता चला। यह केवल संयोग मात्र ही था। मैं उस रजिस्टर के पृष्ठों को उलट-पुलट कर रहा था कि बराबर वाले कमरे में से सिपाही के बोलने की आवाज आई। वह अपने दूसरे साथी सिपाही से कह रहा था।
‘आज फिर हारटन गार्डन बाजार का एक व्यापारी फोन पर कह रहा था कि उनके बहुत सारे हीरे गुम हो गये हैं।’
‘गुम हो गये हैं?’
‘गुम होना, चुराना नहीं,’ इस शब्द ने पहेली का हल पेश कर दिया। हीरों की चोरी नहीं बल्कि गुम हो रहे हैं, इसलिए अपराध रजिस्टर में उनकी रिपोर्ट नहीं थी। अब मैंने पुलिस स्टेशन का दूसरा रिकार्ड देखा। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि लाखों पौण्ड के हीरे गायब हो रहे थे किंतु हीरों के व्यापारी उसकी चोरी नहीं बल्कि पुलिस को यह रिपोर्ट करते थे कि ये हीरे गुम हो गये हैं क्योंकि हीरों के व्यापारी इस पर यकीन करने के लिए किसी प्रकार भी तैयार नहीं थे कि हीरे उनकी तिजोरियों में से गायब भी हो सकते हैं। ये तिजोरियां एक सुरक्षित कमरे की दीवार में जड़ी हुई थीं।
प्रत्येक तिजोरी की अपनी चाबी थी, फिर दिन-रात पुलिस का कड़ा पहरा। चोरी-डाके की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। शाम को हर व्यापारी व्यापार समाप्त करने के उपरान्त अपने हीरे और कीमती जवाहरात अपनी खास तिजोरी के ताले में बंद कर देता था। हर व्यापारी की अलग तिजोरी थी। पूरे बाजार की तिजोरियां एक ही स्थान पर थीं और उन तिजोरियों का उनको किराया देना पड़ता था। उनकी गिनती विश्व की सुरक्षित तिजोरियों में होती थी।
उस इमारत में जहां ये तिजोरियां बनाई गई थी, एक फौलादी दरवाजे द्वारा प्रवेश करना पड़ता था। इस मजबूत दरवाजे का ताला नम्बरों के साथ बंद और खुलता था। एक नम्बर का पता केवल उस इमारतों के प्रबन्धकों को ही था और दूसरे नम्बर का पता जवाहरात के प्रत्येक व्यापारी को था। उस दरवाजे के आगे एक दूसरा दरवाजा भी लोहे का था। यह भी दो चाबियों के साथ खुलता था। हर लिहाज से यह इमारत सुरक्षित थी।
उस दरवाजे से आगे जाने के लिए हर व्यापारी को अपना पहचान पत्र दिखाना पड़ता था और रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे। उस दरवाजे का पहरेदार प्रत्येक व्यापारी को निजी तौर पर जानता था। कोई अजनबी वहां प्रवेश नहीं कर सकता था। मान लीजिये यदि किसी चमत्कार के साथ कोई अजनबी उस दरवाजे के अंदर प्रवेश करने में सफल हो भी जाता तो भी उसके लिए इन फौलादी तिजोरियों में से चोरी करना संभव नहीं था। उसका कारण था कि हर तिजोरी की दो चाबियां थीं। एक चाबी व्यापारी के पास और दूसरी पहरेदार के पास रहती थी किंतु इसके बावजूद भी कीमती हीरे गायब हो रहे थे। इस कारण स्थिति और भी पेचीदा हो रही थी। बहुत सारे व्यापारी उस नुकसान की सूचना पुलिस को देने से झिझकते थे। यदि वे सूचना देते भी तो नुकसान की सही मात्रा नहीं बताते। यह अनुमान किया जा सकता था कि व्यापारी असल नुक्सान को छिपाना चाहते थे।
एक दिन यह सिलसिला अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। एक व्यापारी ने जब अपनी तिजोरी खोली तो उसने एक करोड़ पौण्ड मूल्य के हीरे गायब देखे। वह बहुत परेशान हुआ किंतु उसको जरा भी संदेह न था कि कोई चोरी भी कर सकता है। उसने सोचा शायद मुझसे गिनते समय गलती हो गई होगी। वह चुप रहा। तीसरे हफ्ते जब उसने अपनी तिजोरी से हीरों का पूरा ही डिब्बा गायब देखा जिसमें लगभग पांच करोड़ पौण्ड के हीरे थे, उस समय उसको पुलिस स्टेशन जाना ही पड़ा।
मैं भी इन घटनाओं की असलियत की खोज करता हुआ थक गया था, और अब उस पहेली को हल करने में बिल्कुल निराश हो गया था। मैं सोच रहा था, कि अब मुझे अपने अफसरों के सामने अपनी असफलता का वर्णन कर देना चाहिये, पर मैं एक बार फिर कोशिश कर लेना चाहता था।
शनिवार की शाम थी। मैंने शाम हारटन गार्डन की एक छत पर बिताने का निश्चय किया। मेरे पास एक दूरबीन थी। मेरी आंखों के सामने बहुत सारे चेहरे घूम रहे थे और अंत में मेरी दूरबीन दो आदमियों पर आकर रूक गई। वे दोनों तिजोरियों वाली इमारत में प्रवेश कर रहे थे। मेरी दूरबीन उनका पीछा कर रही थी। मालूम नहीं क्यों उनके चेहरों पर मेरी नजर पड़ते ही जैसे मेरे दिल ने कहा-‘ये दोनों व्यक्ति हैं।‘
दरवाजे के पास जाकर उन्होंने पहरेदार के साथ कुछ बातचीत की और भीतर तिजोरियों वाले कमरे में प्रविष्ट हो गये। मैं ने देखा उन्होंने रजिस्टर पर हस्ताक्षर नहीं किये और बिना हस्ताक्षर किये भीतर प्रविष्ट हो गये थे। हीरे रहस्यपूर्ण तरीके के साथ क्यों गायब हो रहे थे। अंत में मैंने उसका पता लगा ही लिया था और अपने उद्देश्य में सफल हो गया था।
इमारत का पहरेदार सभी व्यापारियों से मेलजोल रखता था और बातों ही बातों में उनकी तिजोरियों में लगे तालों के नम्बर पूछ लेता था। इसी पहरेदार ने उन व्यापारियों की नकली चाबियां बनवाई और अपने साथियों को दी जो अब बाजार में हीरों का व्यापार करते थे। वह अपने हीरे तिजोरी में रखने के बहाने जाते और दूसरे बड़े व्यापारियों की तिजोरियों पर हाथ साफ करते थे।


