
रुद्राक्ष मानव जीवन को उतना ही प्रभावित करता है जितना कि रत्न बल्कि यह कहना चाहिए कि रत्न से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है रुद्राक्ष। रुद्राक्ष का आध्यात्मिक महत्व तो सर्वविदित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में रुद्राक्ष को लेकर जो शोध कार्य हुए हैं और जो चमत्कारिक तथ्य सामने आए हैं, उनको देखते हुए आज के संदर्भ में रुद्राक्ष रत्नों से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बीते वर्षों में ब्रिटेन व अमेरिका के शोधकर्ताओं ने रुद्राक्ष में अनेक प्रभावशाली गुण पे हैं। इसमें सवार्धिक महत्वपूर्ण है- रुद्राक्ष की चुम्बकीय आकर्षण शक्ति रुद्राक्ष की इस आकर्षण शक्ति से न केवल शारीरिक रोगों का निवारण किया जा सकता है वरन मनोनुकूल संतति भी प्राप्त की जा सकती है। एक अमेरीकी महिला शोधकर्ता के अनुसार जो दंपति गुण – संपन्न व मन – मुताबिक संतान प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें रुद्राक्षधारण करने से अपने उद्येस्य में निस्चय ही सफलता मिलती है। इसी प्रकार ब्रिटेन के एक शोधकर्ता छात्र ने रुद्राक्ष में असाध्य रोगों का उपचार ढूंढ निकला है। सम्भवतः यही कारन है कि आज रुद्राक्ष का महत्व रत्नों से भी कहीं अधिक बढ़ गया है।
यदि हम रुद्राक्ष का विचार करें तो वस्तुतः रुद्राक्ष-रूद्र + अक्ष = रुद्राक्ष। रूद्र अर्थात शिव, अक्ष अर्थात आंसू। यानी शिव के अश्रुओं जो बना, वह रुद्राक्ष है। पुराणों में इस संदर्भ में अनेक कथाएं वर्णित हैं। जिनका वर्णन आगे रुद्राक्ष की उत्पत्ति, नमक अध्याय में संदर्भ सहित किया जाएगा।आयुर्वेद में भी औषधिया बनाने के लिए रुद्राक्ष का उपयोग किया जाने लगा है । यह एक फल विशेष का अंकुर है जो बेर की गुठली से काफी मिलता-जुलता है। इसका वृक्ष अमरुद के पेड़ जितना होत है जिस पर कार्तिक या मंगशिर (मार्गशीर्ष) मास में कसैले व कुछ खट्टे से फल लगते हैं। उन फलों को जब निरावरीत किया जाता है वही रुद्राक्ष है।
प्रारम्भ में यह फल हरा होता है जिसे सूखने में कई महीने लग जाते हैं। वनस्पति क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले अन्य फल जहां खाने के काम आते हैं, वहीं रुद्राक्ष नामक यह फल धारण करने के काम आता है, इतना ही नहीं भगवान शिव (रूद्र) से संबद्ध होने के कारण यह न केवल महत्वपूर्ण है वरन सभी देवी-देवताओ को प्रिय भी है। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि मंत्र जाप के लिए यदि सम्बन्धित देवी-देवताओं की माला न मिल सके तो रुद्राक्ष की माला पर मंत्र जाप किया जा सकता है। तंत्रशास्त्र में रुद्राक्ष की माला का विशेष महत्त्व प्रतिपादित किया गया है।
शब्दकल्पद्रुम में रुद्राक्ष को भूतनाशं निलकांठाक्षं शिवप्रियं आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। बंगला, पंजाबी, गुजराती, भोजपुरी, संस्कृत व हिंदी भाषा में रुद्राक्ष ही कहा जाता है। किन्तु तेलगु तमिल व कन्नड़ भाषा में रुद्राक्ष को रुद्राक्षकोटि कहा जाता है।रुद्राक्ष के पेड़ भारत व नेपाल के अतरिक्त मलेशिया, चीन, इंडोनेशिया, तिब्बत, जावा आदि देशों में भी पाए जाते हैं। बेर के आकर का रुद्राक्ष नेपाल मे अधिक होता है। तो मलेशिया मे मटर के दाने के आकर का रुद्रक्ष अधिक होता है ।रुद्राक्ष प्राप्ति स्थलों के बारे मे शिवपुराण में वर्णन मिलाता है की भगवान शिव के प्रिय स्थलों-लंका, मलयाचल, अयोध्या, मथुरा, काशी आदि मे भी रुद्राक्ष पाए जाते है।
जो लोग कीमती रत्नादि नहीं खरीद सकते वे रुद्राक्ष धारण करके ग्रहों की अनुकूलता पा सकते हैं। इसके दर्शन, स्पर्श व धारण से शुभत्व की प्राप्ति होती है। माला रूप में ही नहीं इसे चांदी धातु की अंगूठी मे जड़वाकर भी धारण किया जा सकता है।


