विश्व शांति, आतंकवाद और संयुक्त राष्ट्रसंघ
अशोक कुमार झा
जब विवाद दो लोगों के बीच में होता है तो उसे सुलझाने के लिये ग्राम-पंचायत या पुलिस या फिर न्यायालय के द्वारा उसका समाधान निकाला जाता है। वह समाधान दोनों पक्षों की पूरी दलीलें सुनने व साक्ष्यों के गहन अध्ययन करने के बाद निकाला जाता है तथा इस बात का भी ख्याल रखा जाता है कि वह समाधान ऐसा हो जिससे सामाजिक व न्यायिक व्यवस्था की नींव और भी मजबूत हो सके। साथ ही यह भी ख्याल रखा जाता है कि अपराधियों को उसके किये अपराध की सजा जरूर मिले ताकि आने वाले समय में कोई दुबारा ऐसा अपराध करने की न सोचे।
चाहे इस दुनियां में देश कोई भी हो, हर जगह का अपना एक कानून होता है जिसका पालन करना वहां के नागरिकों के लिये या वहां रहने वाले लोगों के लिये अनिवार्य होता है। उस कानून का उल्लंघन करने या समाज में अशांति फैलाने वाले जैसे किसी भी कार्यों को गैर कानूनी तथा अपराध की श्रेणी में माना जाता है। चाहे देश के सर्वोच्च पद पर बैठे हमारे शासक हों या कोई आम जनता, कानून सभी के लिये होता है और उसका उल्लंघन करने वाले को सजा दी जाती है। यही व्यवस्था हमारी न्यायिक व्यवस्था कहलाती है जो हमें अराजकता की ओर जाने से रोकती है।
परंतु यही विवाद जब दो लोगों की जगह दो मुल्कों के बीच में होता है, तब उसके निबटारे के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय कानून बना हुआ है, जिसके उचित रूप में अनुपालन की जिम्मेवारी संयुक्त राष्ट्रसंघ को दी गयी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जिसके ऊपर पूरे विश्व में शांति व्यवस्था को कायम रखने की जिम्मेवारी है। जब भी किन्हीं दो देशों के बीच में मतभेद इतना अधिक बढ़ जाता है जिससे युद्ध जैसी नौबत आ जाती है तब संयुक्त राष्ट्र संघ नाम की इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था की भूमिका काफी अहम हो जाती है।
प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व दुनियां में ऐसी कोई संस्था नहीं थी जो विश्व को अशांति की तरफ जाने से रोकने की दिशा में कार्य कर सके। इस कारण सभी देश एक दूसरे की सीमा में अपना अधिपत्य जमाने व उसे अपने साम्राज्य में शामिल करने की होड़ में लगे रहते थे। हमारी इसी होड़ के कारण हमें 1914 में प्रथम विश्व युद्व का सामना करना पड़ा जो 1919 तक लगातार चला था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पूरी दुनियां में जमकर नरसंहार हुआ था तथा उसमें काफी संख्या में निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। उसके बाद में पूरे विश्व की शासन व्यवस्था में अवरोध व अराजकता के साथ साथ अर्थव्यवस्था में भी काफी गिरावट आ गयी थी जो स्वाभाविक था। फिर भविष्य में ऐसी भयानक स्थिति दुबारा न हो, उसके लिये दुनियां के बड़े देशों ने मिलकर 1919 में इस महायुद्व के अंत के बाद राष्ट्रसंघ नाम की संस्था का गठन किया।
परंतु बड़े देशों द्वारा छोटे देशों पर हावी होते रहने व उनसे जबरदस्ती अपनी बात मनवाने की प्रवृत्ति के कारण राष्ट्रसंघ अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में सफल नहीं हो सका और 1939 में फिर से विश्व युद्ध हो गया, जब जर्मनी ने यूरोप में अपना बड़ा सा साम्राज्य बनाने के उद्देश्य से पोलैंड पर हमला कर दिया और फिर जवाब में फ्रांस ने जर्मनी पर हमला किया। 1939 से 1945 तक चलने वाले इस महायुद्ध में पूरे विश्व से 70 देशों के करीब 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया था तथा 7 करोड़ से अधिक लोगों की जान चली गयी थी। इस महायुद्ध में काफी संख्या में असैनिक नागरिकों का भी नरसंहार हुआ था तथा युद्ध के अन्त में परमाणु हथियारों का भी इस्तेमाल हुआ था जिसके बदौलत मित्र राष्ट्रों द्वारा अनैतिक रूप से यह युद्ध तो जीत लिया गया था परंतु इतने साल गुजर जाने के बाद आज भी उस युद्ध में हुई क्षति की भरपाई नहीं की जा सकी है।
परंतु भविष्य में ऐसी वैश्विक त्रसदी को दुबारा होने से रोकने के लिये राष्ट्रसंघ की जगह संयुक्त राष्ट्रसंघ का गठन किया गया जिसमें दुनियां के पांच ताकतवर देश स्थायी सदस्य बन गये और उसके बाद जब-जब अंतर्राष्ट्रीय अशांति जैसी स्थितियां आई तो उन देशों द्वारा अपनी शांति सेनायें भेजकर उसे रोकने का प्रयास किया जाता रहा। इन पांच स्थायी सदस्यों में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और चीन हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र में वीटो लगाने का अधिकार प्राप्त है। इन पांचों के अलावा दुनियां के अन्य देशों के पास यह अधिकार नहीं है।
आज हिन्दुस्तान ही नहीं, पूरी दुनियां आतंकवाद जैसी महामारी से जूझ रही है। इस्लामिक स्टेट जैसे खतरनाक आतंकी संगठनों ने पूरी दुनियां में अपने पैर फैलाने शुरू कर दिये है। दुनियां के कई हिस्सों पर उसने परोक्ष रूप से अपना कब्जा भी जमा लिया है और जहां अभी तक नहीं पहुंच पाया है, वहां के युवाओं को धर्म का झूठा वास्ता देकर अपनी तरफ करने में प्रयासरत है। यह तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ते जा रहे कदमों का एक संकेत है, जिसे नियंत्रित कर पाना संयुक्त राष्ट्र के लिये साधारण चुनौती नहीं है।
अब जब बात हम आतंकवाद की करते हैं तो पाकिस्तान का नाम उसमें स्वत: ही आ जाता है क्योंकि पाकिस्तान इस दुनियां का एक ऐसा मुल्क है जो आतंकवादियों को पनाह लेने के लिये जन्नत के समान है परंतु हमारी यही बदकिस्मती है कि वह हमारा सबसे निकट पड़ोसी होने के साथ ही हमसे अलग हुआ हमारा अपना ही टुकड़ा है।
आज आतंकवाद हमारी सबसे बड़ी समस्या होने के बावजूद इसका सभी देशों द्वारा एक साथ मिलकर कोई स्थायी हल निकालने की जगह इस मामले पर दोहरी नीति अपनायी जा रही है। जब आतंकवाद का शिकार खुद अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों को बनना पड़ता है तब सारी अंतर्राष्ट्रीय नियमों की हदें पर करके पाकिस्तान के घर में घुसकर ओसामा बिन लादेन को अपने हाथों से मौत की सजा देता है परंतु वहीं जब हमारी बारी आती है तो पाकिस्तान में रहकर हमारे खिलाफ साजिश रचने वाले तथा जहर उगलने वाले खतरनाक आतंकी मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी मानने से भी मना कर रहा है।
हाल ही में जब हमारी तरफ से मौलाना मसूद अजहर जो पाकिस्तान सरकार से संरक्षित व पोषित है को संयुक्त राष्ट्रसंघ से आतंकी घोषित किये जाने की मांग की जा रही है तब चीन के द्वारा इसके विरोध में अपने वीटो का इस्तेमाल किया जा रहा है जबकि दूसरी तरफ वह खुद ही कहता है कि चीन और भारत दोनों ही समानरूप से आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं। वहीं अमेरिका जो खुद को विश्व-शांति का सबसे बड़ा ठेकेदार कहता है वह अभी इस मुद्दे पर कुछ कहने की जगह चुप क्यों है?
क्या चीन द्वारा किसी आतंकवादी को आतंकी घोषित किये जाने के बीच में रोड़े खड़े करना, आतंकवाद का खुला समर्थन करना और वीटो का दुरूपयोग नहीं है? क्या अगर कोई वीटो का अधिकार प्राप्त एक देश इस तरह से अपने इस अधिकार का दुरूपयोग करे तो शेष चार वीटो का अधिकार प्राप्त देशों को इस तरह हाथ पर हाथ धरे चुपचाप देखते रहना क्या उसका मौन समर्थन करना नहीं है?
अब दूसरा सवाल यह है कि यदि इसी तरह इन पांच महाशक्तिशाली देशों द्वारा अपने वीटों का इस्तेमाल निजी हितों में तथा द्वेष की भावना से किया जाता रहा तो क्या दुनियां से आतंकवाद को पूरी तरह से मिटाना व तृतीय विश्वयुद्ध को होने से रोक पाना कभी संभव हो पायेगा ?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र संघ की वर्तमान संरचना व व्यवस्था ऐसी है जो दुनियां के सभी देशों का भरोसा जीतने के काबिल हो तथा वीटो का अधिकार प्राप्त देश अपने किसी निजी हित में या आपसी द्वेष की भावना से इसका दुरूपयोग न कर सकें? संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के समय इन पांच वीटो प्राप्त देशों को जिस उद्देश्य को ध्यान में रखकर यह अधिकार दिया गया था, आज वह उन उद्देश्यों में मददगार बनने की जगह रोड़े बनने लगे हैं। ऐसे में इतना तो साफ है कि संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान व्यवस्था व उसकी संरचना दुनियां से आतंकवाद को जड़ से खत्म करने व लम्बे समय तक विश्व-शांति को बरकरार रख पाने के लिये पर्याप्त नहीं है।
अगर हमें तृतीय महायुद्ध को होने से सचमुच में रोकना है तो संयुक्त राष्ट्रसंघ की वर्तमान व्यवस्था व संरचना में काफी कुछ सुधार लाना होगा जिससे वीटो के अधिकार प्राप्त इन पांच देशों की तानाशाही व मनमानी से दुनियां को मुक्त किया जा सके। इसके लिये संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद में सदस्यों की संख्या पांच से बढ़ाकर दस या पंद्रह करना होगा जिसमें भारत सहित उन अन्य गुटनिरपेक्ष देशों को भी शामिल करना होगा जो वास्तव में इसके हकदार हैं तथा उन्हें भी वह सारे अधिकार देने होंगे जो इन पांच देशों के पास होंगे। साथ ही अगर किसी वीटो का अधिकार प्राप्त देशों के द्वारा इसका किसी आपसी द्वेष व दुर्भावनावश दुरूपयोग किया जाता है तो सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों द्वारा उसकी समीक्षा की जा सके तथा विश्व शांति और दुनियां से आतंकवाद को खत्म करने की राह में रोड़े बनने वाले देशों को बिना किसी भेदभाव के समय पर समुचित जवाब दिया जा सके।
तभी हम विश्व शांति के उद्देश्य से बनी संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता बचा पाने व पूरी दुनियां के लिये महामारी बने हुए आतंकवाद को काबू पाने की दिशा में कुछ कर पायेंगे अन्यथा इस भेदभाव पूर्ण नीति के कारण हमारे अंदर का आतंकवाद कम होने की बजाय और विकसित होता ही चला जायेगा और वही आगे चलकर तृतीय विश्वयुद्ध का कारण बन जायेगा जिसे रोक पाना फिर हमारे बस में नहीं होगा।


