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मनीष तिवारी
बजट पेश करते समय हरेक वित्तमंत्री यह वाक्य अवश्य कहता है कि देश आज संकट के दौर से गुजर रहा है, देश की आर्थिक स्थिति अत्यन्त खराब है। यह वाक्य जब से मैंने होश संभाला है और मुझमें बजट भाषण सुनने की तमीज आई है, तब से हालिया बजट तक सुनता रहा हूँ और इस कठिन परिस्थिति वाले युग में भविष्य में जीवित रहा तो सुनता रहूँगा। आखिर हमारा धर्म सनातन धर्म यूँ ही नहीं कहलाता, सनातन यानी आदि से अन्त या अनन्त तक।
वाकई हमारा राष्ट्र सदैव संकट में रहता है। मुझे लगता है, जब पन्द्रह अगस्त सैंतालीस को पण्डित नेहरू ने राष्ट्र को सम्बोधित किया होगा तो यह वाक्य ‘संकट में देश’ अवश्य कहा होगा। उसके बाद हर बरस आजादी की बरसी पर यह वाक्य दुहराने, तिहराने, चौहराने…..की परम्परा पड़ गई। यह परम्परा तोड़ी भी कैसे जा सकती है?
परम्परा हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है, ठीक वैसे ही जैसे काश्मीर हमारा अभिन्न अंग है। यह भी सच है कि हमारे अभिन्न अंग के तीन चौथाई हिस्से पर हमारे पड़ोसी का अवैध कब्जा है। वित्तमंत्री इस कब्जे के पश्चात् कुछ करों में वृद्धि या राहत की घोषणा करते हैं तथा यह दावा भी करते हैं कि अगले बजट तक राष्ट्र को संकट से निकाल लिया जाएगा यानी देश में संकट करदाताओं की जेब के जादू से सुलझाना संभव है।
वित्तमंत्री तो वित्तमंत्री, प्रत्येक प्रधानमंत्री हर पन्द्रह अगस्त को राष्ट्र के संकटग्रस्त होने की घोषणा करता है। हरेक प्रधानमंत्री अपनी पहली पन्द्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते समय सर्वप्रथम अपने आपको साधारण परिवार से आया हुआ बताकर भारत की लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति की सराहना करते नहीं अघाता जिसने उसे इस उच्च स्थान पर पहुंचाया, पर वाकई क्या यह तथ्य सराहनीय है?
लोकतन्त्र के सराहनीय स्वरूप को प्रत्येक नागरिक भोग रहा है, देख रहा है कि सत्र के दौरान अधिकतर समय सदन चलने ही नहीं पाता। ‘साम दाम दण्ड भेद’ चारों रूप लोकतन्त्र में समाहित हो गए हैं, फिर भी देश संकट में है।
और तो और, बड़ी पार्टियों तथा एकाध सांसद वाली पार्टियों के अध्यक्षगण भी पदभार सम्भालते वक्त यही आदर्श वाक्य दुहरा देते हैं कि देश संकट में है या संकट से गुजर रहा है। मेरी समझ में नहीं आता कि राष्ट्र संकट में तब ही क्यों होता है, जब ये नेतागण सत्तासीन होते हैं। देश इन नेतागणों के सत्तारूढ़ होते ही संकटग्रस्त हो जाता है और ये नेता संकट मुक्त। संकटमुक्त ये तत्व देश को घोटाला, भ्रष्टाचार, मँहगाई के क्षेत्र में उन्नति के एवरेस्ट की ओर ले जाते हैं।
न जाने कब तक ये नेता रहेंगे और कब तक संकट में देश रहेगा। लगता है नेता और संकट देश का नया पर्याय बन चुके हैं। लगता है हम सदा संकटग्रस्त थे, सदा हैं और सदा ही रहेंगे। मुझे तो निकट भविष्य में देश के संकट से उबारने की कोई सूरत नजर नहीं आती। अब हमें देश के संविधान की प्रस्तावना में ‘संकटग्रस्त’ शब्द और जोड़ देना चाहिए।


