
लेख़क – नरेंद्र देवांगन
प्राचीन काल से ही हमारे देश में विभिन्न पर्व-त्योहारों पर सामूहिक स्नान की परंपरा रही है। कुछ नदियों को हम देवी मानते हैं और यह मान्यता है कि उनमें स्नान करने से शरीर के साथ-साथ मन भी स्वच्छ हो जाता है अर्थात आदमी पाप मुक्त हो जाता है।
सामूहिक स्नान विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग स्थान पर विभिन्न नदियों, तालाबों तथा झीलों में होते हैं जैसे सूर्यग्रहण के समय कुरूक्षेत्र स्थित ब्रह्मा और सन्निहित सरोवर में, कुंभ के समय हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन तथा नासिक में, संक्रान्ति के समय बनारस और हरिद्वार में तथा कार्तिक पूर्णिमा के समय गढ़ मुक्तेश्वर में। सूर्यग्रहण के दौरान किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि सामूहिक स्नान से पानी प्रदूषित होता है।
अनुमान है कि चमड़े की ऊपरी पर्त के एक मिलीमीटर भाग में लगभग 5,3०,००० जीवाणु होते हैं। पानी में नहाने के दौरान इनका एक बड़ा भाग पानी में मिल जाता है। मनुष्य के मुंह में करीब सौ प्रकार के जीवाणु पाए जाते हैं जो लार, थूक या कुल्ला करने के समय पानी में मिल जाते हैं। अनुमान किया गया है कि एक वयस्क स्वस्थ मनुष्य अपने दैनिक क्रि याकलापों द्वारा प्रतिदिन 17० खराब जीवाणु अपने शरीर से बाहर निकालता है।
हमारे यहां धारणा यह है कि पवित्र नदियों तथा तालाबों में नहाकर विभिन्न रोगों से मुक्ति मिल जाती है, अत: सामूहिक स्नान के दौरान कई बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति भी आते हैं और इनके नहाने के समय रोगाणु पानी में पहुंचकर अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
धार्मिक स्थानों में स्नान करने के अलावा घी, दूध, अन्न, फल, फूल, पत्तियां तथा हवन की बची-खुची सामग्री भी पानी में डाल दी जाती है। इस प्रकार कार्बनिक पदार्थों के सडऩे की क्रिया में काफी मात्रा में ऑक्सीजन गैस का उपयोग होता है। यूं भी पानी में ऑक्सीजन काफी मात्रा में होती है तथा यह पानी के जीवधारियों जैसे मछली इत्यादि के लिए आवश्यक होती है।
पदार्थों के सडऩे की क्रि या में पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और जैव रासायनिक मांग बढ़ती जाती है। अत: प्रदूषित पानी में जैव रासायनिक मांग अधिक होती है। सामूहिक स्नान के दौरान प्रति व्यक्ति तीन से बाइस ग्राम तक कार्बनिक पदार्थों की पानी में वृद्धि करता है। नदियों में बहते हुए पानी के कारण प्रदूषण का प्रभाव जल्दी खत्म हो जाता है पर तालाबों और झीलों में जहां पानी का बहाव नहीं होता, वहां प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है।
सामूहिक स्नान के दौरान अनेक अवसरों पर लाखों लोग नदी या तालाब के इर्द-गिर्द कुछ दिनों तक रहने के साथ-साथ खाना बनाना, बर्तन साफ करना, शौच इत्यादि भी करते हैं। इनका कुछ भाग पानी में जा कर उसे प्रदूषित करता है। सामूहिक स्नानों से स्वास्थ्य पर होने वाले कुप्रभाव का ज्यादा अध्ययन नहीं किया गया है लेकिन यह निश्चित है कि ऐसे स्नान के बाद पेचिश, हैजा, खुजली और त्वचा पर विभिन्न प्रकार के घावों के होने की शिकायत सामान्य है। ऐसे व्यक्तियों को आंख, नाक, कान और गले की बीमारियों का भी खतरा रहता है।
सामूहिक स्नान प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जरूरी है कि ऐसे अवसरों पर संबंधित अधिकारी जल की गुणवत्ता का विशेष रूप से ध्यान रखें। जीवाणुओं की संख्या को कम करने का सबसे सरल और सस्ता उपाय है कि ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग पर इसका उचित मात्रा में उपयोग अनिवार्य है क्योंकि ज्यादा होने पर यह भी मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और कम होने पर जीवाणुओं पर असर नहीं करता।
लोगों के मल-मूत्रा त्यागने के लिए ऐसे इंतजाम किए जाएं कि जिससे उसका कोई भी भाग पानी में न आने पाए। लोगों के ठहरने का इंतजाम नहाने की जगह से कुछ दूर होना चाहिए। लोगों को प्रदूषण के बारे में शिक्षित करने की। उसके प्रभाव बताने की आवश्यकता है जिससे सभी मिलजुलकर पानी को साफ रखने और स्नान योग्य बनाने में मदद करें।


