
उषा जैन ‘शीरीं’
सर्जना कायनात ट्रैव्हल्स में बतौर मैनेजर कार्य कर रही थी। बेबी होने के बाद उसके लिए घर – बाहर दोनों फ्रंट संभाल पाना मुश्किल हो रहा था। सो उसने नौकरी छोडऩा तय किया लेकिन एक मेहनती काबिल और अनुभवी एम्पलॉयी से कंपनी हाथ नहीं धोना चाहती थी। सो उन्होंने सर्जना को घर से ही कम्प्यूटर व टेलीकम्युनिकेटिंग के जरिए ऑफिस प्रोजेक्ट्स पूरे करने की अनुमति दे दी।
इसे ही होम फ्रैंडली ऑफिस का चलन कहा जाता है जिसका कि चलन बढ़ रहा है क्योंकि यह वक्त की मांग और जरूरत है। ज्यादातर औरतें मल्टीटास्क में माहिर होती हैं और काम के प्रति सिंसियर होती हैं इसलिए ऑफिस कार्य के लिए उनकी मांग ज्यादा रहती है। कंपनियां जहां उनकी समस्याऐं तकलीफें देख उनके साथ कोऑपरेट करती हैं, वहीं वे अपना फायदा भी पूरा देखती हैं।
ग्लोबलाइजेशन के युग में काम काज के तरीकों में काफी फेरबदल हुआ है उन्हीं में से है एक वर्चुअल वर्किंग सिस्टम यानी कि होम फ्रैंडली ऑफिस सिस्टम। बेबी सिटिंग के साथ ही महिलाएं अपनी क्रिएटिविटी व टैलेंट के अनुरूप कार्य कर उन्हें जंग लगने से बचा सकती हैं।
आई.टी. के क्षेत्र में क्रांति आ जाने से कल्पनातीत बदलाव आये हैं। ऑर्गेनाइज़ेेशंस भी समय के साथ चलते हुए बहुत सी ऐसी नई-नई बातें अपना रहे हैं जो परंपरा से हटकर हैं। ऐसा वे अपनी सहूलियते देखकर ही कर रहे हैं। कार्य के फ्लेक्सीबल आवर्स काम करने वाले के लिए भी आसानियां पैदा कर देते हैं। इससे वे तनावरहित होकर अपना बेहतर प्रदर्शन करते हैं। टेलीकम्युनिकेटिंग, हाइस्पीड मैसेज व इंफर्मेशन की उपलब्धता ने कर्मचारियों और आर्गेनाइजेशन दोनों के लिए सुविधाएं बढ़ाई हैं।
वर्चुअल रहने की अनुमति यानी कि घर बैठे ऑफिस कार्य की परमिशन मिलने से जहां आने जाने के समय की बचत है, पैसे की भी बचत होती है हम इसें इकोफ्रैंडली भी मान सकते हैं। जितने कम लोग ट्रेव्हल करेंगे, पॉल्युशन भी उतना ही कम होगा। यह एनर्जी सेवर भी होगा। आने जाने में ट्रैफिक जाम, शोर भीड़ समय की बर्बादी और उससे उपजे तनाव के कारण काफी ऊर्जा नष्ट होती है। वर्चुअल रहने पर ऑफिस का कार्य सुकून से किया जा सकेगा। कर्मचारियों द्वारा दिये गए अच्छे रिजल्ट इस बात के साक्षी हैं।
महिलाओं के लिये तो यह किसी वरदान से कम नहीं। घर बाहर का संतुलन बनाने में जहां वे बेहद तनावों से घिर जाती थीं, जब बाहर भी घर में ही सिमट आये तो दो नावों में पैर रखने जैसी स्थिति नहीं रहती है। अगर आपके पास टैलेंट और काम की एफिशियंसी जैसे गुण हैं मगर परिस्थितियों के कारण आप कोई नौकरी नहीं कर पा रही हैं तो वर्चुअल वर्किंग आपको फस्ट्रेट होने से बचा सकता है, ऐसा कहती हैं एक एम. एन. सी. के लिए कार्य करने वाली अभया सरकार।
होम फ्रैंडली ऑफिस सिस्टम सिर्फ कर्मचारी के लिये ही नहीं, ऑर्गेनाइजेशन के लिये भी एक उपयोगी सिस्टम के रूप में उभर रहा है। आज जब बड़े शहरों में जगह की कमी हैं और उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं तो यह सिस्टम एक अच्छा विकल्प बनकर सामने आया है जिसमें बचत भी है। यह रकम कंपनी अपने कार्य के एक्सपेंशन व लोगों को रिकूट करने में लगा सकती हैं।
होमफ्रैंडली ऑफिस सिस्टम की आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं। उनके अनुसार इससे वर्क एफिशियंसी प्रभावित होती है। पी.आर. नहीं बन पाता, क्लाइंट्स व कलीग्स से संपर्क नहीं जुड़ पाता।
बहरहाल एक्सपर्ट्स की मानें तो वर्चुअल वर्किंग का चलन और बढ़ेगा ही। सोशियालॉजिस्ट अमन कुकरेजा कहते हैं कि आज ऑफिस गोइंग महिलाएं ऑफिस की भागदौड़ और घर से बाहर कई-कई घंटे रहने के कारण जो असंवेदनशील होती जा रही हैं, उनमें जो रूखापन बढ़ता जा रहा है और प्रोफेशनलिज्म उनके नारीत्व को ठेस पहुंचा रहा है। घर पर रह कर ऑफिस कार्य करने से उनमें ये अवगुण नहीं होंगे। वे वैसी ही रहेंगी जैसा प्रकृति ने उन्हें ओरजिनली बनाया था। इसमें दो राय नहीं कि इस बात में एक गहरा सत्य निहित है।


