
नरेंद्र देवांगन
राष्ट्रीय जागृति तभी ताकत पाती है, तभी कारगर होती है जब उसके पीछे संस्कृति की जागृति हो और आप जानते हैं कि एकता में कितना बल है। अब्राहम लिंकन का कहना है, ‘डेमोक्रेसी इज द गवर्नमेंट ऑफ द पीपुल, वाई द पीपुल एंड फॉर द पीपुल’ अर्थात जनता के द्वारा जनता के लिए तथा जनता का शासन।
सरकार राज्य के चार तत्वों में से एक है। सरकार के काम को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार की आवश्यकता भी होती है। सरकार की उपस्थिति के कारण राज्यों के नागरिक अपने-अपने कार्यों को शांतिपूर्वक कर लेते हैं और कोई भी किसी पर अत्याचार करने की हिम्मत नहीं करता।
सरकार के दो कार्य हैं, जिनमें एक है अनिवार्य कार्य। अनिवार्य कार्य वे हैं जिन्हें सरकार को अवश्य पूरा करना होता है। राज्य का आर्थिक विकास करना सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए सरकार उद्योग-धंधों का विस्तार करती है। यातायात के साधनों को विकसित करती है।
सरकार के कार्य बहुत बढ़ गए हैं। आजकल संसार की अधिकांश सरकारें शिक्षा का प्रचार करने और लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने का कार्य कर रही हैं। प्रत्येक देश में कुछ ऐसी कुरीतियां होती हैं जिन्हें दूर करना सरकार का कर्तव्य होता है। सरकार का यह भी कर्तव्य है कि वह असहाय लोगों की यथोचित सहायता करे। इसी उद्देश्य हेतु सरकार निर्धन गृहों, पागलखानों, अस्पतालों, औषधालयों आदि का प्रबंध करती है। भारत जैसे विकासशील देश में भी सरकार को ऐसे कार्यों पर विशेष ध्यान देना पड़ता है।
सरकार हमारे आचरण के लिए नियम बनाती है और उन्हें कार्यरूप में परिणित करती है। यदि हम उन नियमों को तोड़ते हैं तो सरकार हमें दंड देती है। पूंजी के अभाव के कारण प्राकृतिक संपदाओं का समुचित उपयोग नहीं हो सकता। कुछ लोग खाते-खाते मर रहे हैं तो कुछ लोग भूख के कारण मर रहे हैं। सभी की रक्षा के लिए ही कानून हैं।
सरकार के कुछ अन्य ऐसे कार्य हैं जिनके लिए हमारी सहायता की आवश्यकता है। बूंद-बूंद करके सागर बना है। यदि कहीं अकाल पड़े तो सभी एक-एक रूपया भी दें तो अरबों हो सकते हैं। इसी प्रकार यह टैक्स है जो सरकार हमसे लेती है और हमारे कार्य में ही लगा देती है।
पर जब सरकार जनता पर टैक्स लगाए तो जनता को ऐसा अहसास होना चाहिए कि वह टैक्स नहीं, एक छोटा-सा शुल्क सहयोग के रूप में सरकार को अदा कर रहे हैं। सरकार जनता पर भारी भरकम टैक्स न लादे। जनता पर टैक्स का बोझ हल्का होगा तो टैक्स पटाने में जनता रूचि लेगी। टैक्स चोरी में भी कमी आएगी।
यह सर्वविदित है कि विगत कुछ वर्षों में जनता के ऊपर अनाप-शनाप टैक्स लादे गए हैं। सर्विस टैक्स, वैट टैक्स, शिक्षा उपकर के साथ-साथ राज्य सरकार, नगर निगम एवं नगर निकायों के द्वारा भी बेतहाशा टैक्स जनता पर थोपे जा रहे हैं। विचारणीय बात यह है कि सरकार अपने खर्चों में कमी करने के बजाय उन्हें बढ़ाती जा रही है और करों की वसूली नहीं होने, जनता के द्वारा टैक्स नहीं भरने जैसे दोषारोपण जनता पर लगा कर नए-नए कर एवं वर्तमान करों की दरों में बढ़ोतरी करती जा रही है।
यह भी सबसे हास्यास्पद बात है कि जनता के द्वारा ही चुन कर नगर परिषद, विधानसभा एवं लोकसभा में भेजे गए सदस्य अपनी सुविधाओं एवं वेतन, भत्तों में बढ़ोत्तरी जैसेे मुद्दों पर एकमत हो जाते हैं और मनमानी सुविधाएं लेते हैं। उस समय यह बात कहीं नहीं उठती कि सरकार किस तरह से वर्तमान खर्चों में कटौती करेगी। उस समय इस बात को कहीं नहीं उठाया जाता कि हम कार का उपयोग कम करके पेट्रोल बचाएंगे, टेलीफोन का कम उपयोग कर बिल कम करेंगे, अपने बिजली के उपकरणों में कटौती कर बिजली बचाएंगे या अपने बंगलों के खर्च कम करेंगे लालफीताशाही से निकल कर अपनी लंबी-चौड़ी फौज कम करके राष्ट्रीय बचत में अपना सहयोग करेंगे जिससे वह पैसा राष्ट्र के विकास एवं गरीब जनता के काम आ सके।
इसी के साथ बढ़ते भ्रष्टाचार से भी जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ा है क्योंकि जो पैसा किसी कार्य विशेष में लगना चाहिए, वह नौकरशाहों के हाथों से गुजरते हुए निश्चित स्थान पर पहुंचने तक मुश्किल से दस प्रतिशत रह जाता है। जब कार्य पूरा नहीं होता या फिर आधा-अधूरा होता है और फिर उसी कार्य के संपादन के लिए बजट का प्रावधान होता है और जनता पर टैक्स लगा कर धन इकठ्ठा किया जाता है।
सरकारी तंत्र के दिल में हमेशा यह बात बैठी रहती है कि हम इस देश के सर्वहारा हैं, हम ही देश को चला रहे हैं इसलिए हम जैसा चाहेंगे, वैसा ही देश चलेगा। उनकी राय में देश की जनता निकम्मी, खर्च करने वाली एवं अनुत्पादक है। इसलिए इसका उपयोग केवल टैक्स लगाने के लिए ही किया जाए और हम उसकी वसूली कर मनमानेे तरीके से उसे खर्च करते जाएं।
यह विडंबना ही है कि आज सरकार में लालबहादुर शास्त्री जैसे व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने देश में अनाज का संकट होने पर पहले खुद उपवास रखा, फिर जनता से अपील की। चाणक्य ने टैक्स को परिभाषित करते हुए कहा था, ‘जिस तरह जेब से एक पैसा निकलने पर संबंधित व्यक्ति को दुख नहीं होता, उसी तरह जनता पर, सरकार की व्यवस्थाओं को चलाने के लिए नाम मात्र का टैक्स लगाना चाहिए।’
उक्त बातों के विपरीत वर्तमान समय में अधिक से अधिक करारोपण सरकार की हठधर्मिता होती जा रही है क्योंकि सरकार अपने खर्च कम करने में अपने को असमर्थ पाती है। इसी कारण वह जनता पर टैक्सों की भरमार कर देती है और इसके बावजूद सरकार के खर्चे पूरे नहीं हो पाते।
सरकार को बदलते परिवेश में अपने खर्चों में कमी करने के सघन एवं कारगर उपाय करने चाहिए और जनता पर टैक्स का बोझ कम करना चाहिए जिससे उसे कुछ राहत मिल सके।


