सरकार किसके लिए?
अशोक महिश्वरे
सरकार राष्ट्र की आत्मा होती हैै। काया के भीतर आत्मा का जो स्थान होता है वही स्थान राष्ट्र के भीतर सरकार का होता है? सरकारें कैसे बनती है? प्रत्येक राष्ट्र की पद्धति भिन्न होती है। यह भिन्नता उस राष्ट्र द्वारा सृजित कानूनी स्वरूप पर आधारित होती हैै। संविधान वर्णित पद्धति में सरकारें सत्तासीन पदच्युत होती है। सरकार का दायित्व राष्ट्रहित में कार्य करना होता है किन्तु भारतीय सरकारों का परिदृश्य कुछ भिन्न होता है।
हमारी लोकतांत्रिक पद्धति में चुनाव से सरकार गठन की प्रक्रि या प्रारम्भ होती है। राजनैतिक दलों द्वारा चुनाव में अपनी-अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं का बखान कर जनता से समर्थन माँगा जाता है। राजनैतिक दल अपने घोषणा-पत्रों में उन मुद्दों का अधिकाधिक समावेश करता है जो सीधे जनता से जुड़े होते हैं। यह विचित्र यथार्थ है कि इन लुभावने वादों से जनता का मत प्रभावित होता है। जनता जिस घोषणा-पत्र को अपने फायदे का समझती है, उसकी ओर अपना रूख मोड़ लेती है। यह रूख जब बयार बन जाती है, तब अप्रत्याशित ढंग से सरकार बनती है।
सत्तासीन होने का जश्न शान्त होने के पश्चात् सरकार अपना कार्य प्रारम्भ करती है। इन कार्यो से उसके घोषणा-पत्र का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए क्योंकि चुनाव के दौरान जारी घोषणा-पत्र किसी दल का था न कि सरकार का। सरकार ने कोई घोषणा-पत्र जारी नहीं किया। वह करती भी नहीं क्योंकि वह तो केवल काम करती है। राजनैतिक दल और सरकार में बड़ा अन्तर होता है।
अविवाहित और विवाहित में जो अन्तर होता है, वही अन्तर दल और सरकार में होता है। एक अविवाहित युवा अपने विवाहोपरान्त जीवन पर बड़ी-बड़ी भावी डींगें मारता है जो कि विवाह-पश्चात् उसके जीवन में ढूँढने पर भी दिखाई नहीं देता।
चुनावी घोषणा-पत्र पार्टी द्वारा विधिवत रूप से जारी होता है। इसके बावजूद भी इसकी कोई सत्यता नहीं होती। भारत का कोई भी कानून उस दल की सरकार को अपने वादे पूरे करने पर विवश नहीं कर सकती। अब यदि आप इसे न्यायालय में चुनौती देना चाहते हैं तो भी आपकी याचिका खारिज कर दी जावेगी, शायद इसलिए क्योंकि भारतीय वादे कानूनी नहीं होते। हमारा संविधान यहाँ पहुँचकर मौन व्रत धारण लेता है। यह हमारे लोकतंत्र का सबसे भद्दा मजाक है। लोकतंत्र में हास्य एवं वीभत्स रस का यही निवास है। हमारा संविधान यहाँ इतना विवश क्यों है? यदि यह विवश नहीं होता तो सारा काला धन भारत पहुंच चुका होता। प्रत्येक नागरिक के खाते में 15 लाख रूपए जमा हो गये होते। देश की सारी समस्याओं का समाधान हो चुका होता है। हर चेहरे पर लखपति मुस्कान होती पर बदकिस्मती यह कि संविधान निर्माता यहां चूक गये।
अब प्रश्न यह है कि सरकार कथड़ी ओढक़र सोती तो नहीं, काम करती है, पर किसके लिए? आप कहेंगे जनता के लिए। यदि सरकार जनता के लिए काम करती तो जनता स्वयं को ठगा सा महसूस क्यों करती? सरकार जनता के लिए काम नहीं करती बल्कि सरकारी काम से जनता का भला हो जाता है। मान लीजिए किसी स्थान पर कोई नेता आ रहा है। वहाँ की सडक़ें रातों रात सुधर जाती हैं। बिजली पानी की व्यवस्था हो जाती है। शिक्षा स्वास्थ्य का अमला चौकस हो जाता है मानो रामराज्य आ गया हो। नेताजी को सब कुछ चकाचक देखने की आदत है। नेताजी इस आदत से जनता का भला हो जाता है।
विकास कार्यो की आवश्यकता सरकार को है, जनता को नहीं। विकास के काम करना सरकार की मजबूरी है। विकास कार्य ही वह स्रोत है जिससे चुनावी फंड संग्रहीत होता है। सरकार सडक़ बनाने का कार्य प्रारम्भ करती है। जिसे इस काम का ठेका मिलता है; वह ठेकेदार पार्टी को फंड देता है। नेता को कमीशन देता है। यदि विकास कार्य न हो तो फंड और कमीशन कैसे प्राप्त होगा? बगैर फंड और कमीशन के लोकतन्त्र जीवित नहीं रह सकता। लोकतन्त्र को जीवित रखने के लिए विकास कार्य आवश्यक है।
सरकार का सारा काम अपने दलगत हित पर केन्द्रित होता है। सरकार किसी काम को तब तक नहीं करती जब तक कि उसमें उसका दलगत स्वार्थ जुड़ा न हो। सरकार के सारे काम अपने दल को आगामी चुनाव में पुन: सत्तासीन करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। वह सरकार सफल सरकार मानी जाती है जो अपने कृत्यों से अपने दल के वोट बैंक मे बढ़ोत्तरी करें। अरे भाई, सरकार में रहकर वोट की फसल नहीं पकाई तो क्या खाक राजनीति की। जनता का भला तो अपने आप हो जाता है। सरकार की बनवाई सडक़ पर जनता चलती है भलेे ही पलता कोई हो? अब हमें सोचना है कि सरकार चलने वाले की है या पलने वाले की?


