क्या रक्षा सौदों में दलाली रोक पाना असंभव है

क्या रक्षा सौदों में दलाली रोक पाना असंभव है

  • नरेंद्र देवांगन

रक्षा उपकरणों से संबंधित सौदे और विवाद साथ-साथ चलते रहे हैं। ज्यादातर सौदों में दलाली कितनी ली गई और किसने ली, सुर्खियों में आती है लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ये आरोप केवल राजनीतिक हो कर रह जाते हैं। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं लेकिन साबित कुछ नहीं हो पाता। सवाल इतना सा रह जाता है कि दलाली लेने वालों ने कहीं देश की सुरक्षा का सौदा तो नहीं कर डाला?

 

हाल ही में अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद में दलाली लेने का मामला सुर्खियों में है लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस मामले का भी केवल राजनीतिक इस्तेमाल ही हो रहा है? क्या रक्षा सौदों में दलाली रोक पाना संभव है और है तो कैसे?

 

रक्षा सौदे और उससे घोटालों के जुड़ाव का हमारे देश में तो चोली-दामन का साथ हो गया है। यह कोई आज की बात नहीं, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से ये घोटाले चल रहे हैं। कभी जीप खरीद घोटाला तो कभी बोफोर्स घोटाला और कभी ताबूतों की खरीद में घोटाला, यानी देखा जाए तो हर पांचवें साल में कोई न कोई घोटाला रक्षा सौदों में सामने आता ही रहा है। जब भी रक्षा उपकरणों से संबंधित सौदों में दलाली की बात आती है तो स्वाभाविक तौर पर चिंता होती है कि दलाली खा कर क्या देश की सुरक्षा के साथ समझौता कर लिया गया है?

 

रक्षा सौदों में गड़बडिय़ों के कारण जो सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है, वह यह है कि हमारी सेना का मनोबल कमजोर होने लगा है। सेना को आधुनिक उपकरणों व हथियारों से लैस करने की जरूरत है लेकिन अब कोई सौदा करने की बात आती है तो जिम्मेदार लोग हिचकिचाते हैं। राजनेता और नौकरशाह दोनों को कोई भी कदम उठाने के पहले दस बार सोचना पड़ता है लेकिन चिंता की बात यह है कि सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के अलावा कभी किसी मामले में ठोस नतीजे सामने आए ही नहीं।

अगस्ता हेलीकॉप्टर खरीद में हुई गड़बडिय़ां और भ्रष्टाचार बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इसकी मौजूदा सरकार को पूरी जांच करनी चाहिए। इसमें अहम बिंदु यह है कि वीवीआईपी के लिए ऐसे वाहनों की खरीद के लिए पीएमओ से सलाह-मशविरा किया जाता है।

 

क्यूआर(क्वॉलिटेटिव रिक्वायरमेंट) के लिए पीएमओ से पूछा जाता है। वायुसेना इस वाहन के तकनीकी प्रदर्शन और सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बिंदुओं को स्पष्ट करती है, मसलन कोई हेलीकॉप्टर कितना ऊंचा और कितनी दूर तक और कितने समय तक उड़ सकता है। पीएमओ से पूछा जाता है कि उनकी क्या जरूरतें हैं, हेलीकॉप्टर का वजन क्या हो सकता है। किस तरह के हेलीपैड की जरूरत होगी, यह सब चर्चा एयरफोर्स और पीएमओ के बीच चलती है।

 

रक्षा उपकरण संबंधी सौदों में काफी सतर्कता बरती जाती है। कंपनी के लोग संबंधित लोगों से संपर्क करते हैं और भारतीय सेना की जरूरत के मुताबिक सामग्री की खरीद होती है। एक-एक सौदे में वर्षों लग जाते हैं। अब तो इतनी अधिक सावधानी बरती जाने लगी है कि सौदे को ले कर जरा सी भी हेराफेरी की अफवाह पर ही सौदे रद्द कर दिए जाते हैं और कंपनी को काली सूची में डाल दिया जाता है। अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर सेे संबंधित समझौते में ऐसा ही हुआ। इसी तरह कई और भी कंपनियां हैं जिन्हें भारत की ओर से काली सूची में डाल दिया गया।

 

मामूली सी बात पर रक्षा उपकरण तैयार करने वाली कंपनी को काली सूची में डाल देने से हम हमारे दुश्मनों के मुकाबले तकनीकी तौर पर काफी पिछड़ते चले जाते हैं। कई बार रक्षा सौदों को ले कर केवल आरोप लगाए जाते हैं और बाद में पता लगता है कि इन आरोपों को साबित करना बेहद कठिन है। ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर काली सूची में डाल दी गई कंपनी से हो सकने वाले बेहतर समझौते नहीं हो पाते। इस तरह कुल मिला कर हानि देश की ही होती है।

 

रक्षा उपकरण बेचने के लिए कंपनियों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होती है। ऐसे में यदि किसी एक कंपनी के साथ सौदा होता है तो अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियां यह दिखाने की कोशिश करने लगती हैं  कि सौदे में कुछ न कुछ हेराफेरी जरूर की गई है। इस तरह की अफवाहों पर खबरें भी बनती हैं और बाद में कुछ साबित नहीं हो पाता। यदि इस तरह की खरीदी में गड़बड़ी होती भी है तो ज्यादा बड़ी बात यह नहीं लगती कि यह किसने की बल्कि यह गड़बड़ी अब भी कहां हो रही है, उसे बाहर लाने की जरूरत है। राजनीतिक तंत्र यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकता है कि दलाली को वैध कर देने से समस्या का समाधान निकल जाएगा।

 

सवाल है कि जब भी कोई गड़बड़ी हो तो उन व्यक्तियों को निशाने पर लिया जाए। वे फौरन सलाखों के पीछे हों। जांच में ही बरसों नहीं गुजरने चाहिए। हमारी विजिलेंस को पुख्ता क्यों नहीं किया जा सकता। खासतौर पर, रक्षा तंत्र का प्रदर्शन का काम तो अव्वल रहना चाहिए। रक्षा खरीद से जुड़ी फाइलों की नियमित जांच होनी चाहिए। ऑडिट होते रहना चाहिए। अगर जब भी किसी फाइल में गड़बड़ नजर आए तो वहीं कार्रवाई हो। दस-दस साल का वक्त कार्रवाई में लग जाता है। अगर गड़बड़ है तो तथ्यों को सामने रखें और तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की जाती। इतने बड़े-बड़े आरोप लगते हैं पर कार्रवाई और सजा किसको हुई?

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