
नरेंद्र देवांगन
सरकार आर्थिक प्रगति को चहुंमुखी बनाने की दिशा में काम करते हुए कृषि उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देने को विशेष प्राथमिकता दे रही है। वह गांव के उत्पाद को अच्छा बाजार प्रदान करके कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण और कृषि विकास बैंक को मजबूत आधार प्रदान किया जा रहा है। कृषि उत्पादों को बाजार में लाने के लिए मजबूत आपूर्ति व्यवस्था लागू की जा रही है और राज्य सरकारों को इसके लिए प्रोत्साहित करने की योजना बनाई जा रही है।
यह सच है कि सभी राजनीतिक दल किसान के हित की बात करते हैं और सत्ता में आते ही अपनी योजनाओं का खाका भी तैयार करते हैं लेकिन जमीन पर कुछ बदलता नहीं है। कृषि उत्पाद का लाभ हर बार बिचौलिए खा जाते हैं। किसान को उसकी फसल की कीमत तक नहीं मिल पाती है। किसान की हालत लगातार खराब हो रही है लेकिन सरकारी दावे और उसके आंकड़े निरंतर मजबूत हो रहे हैं।
समस्याओं का मारा किसान आए दिन आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। वह अपने खेत में जो भी फसल उगा रहा है उसकी मामूली कीमत ही उसे मिल रही है। वह ज्यादा पैदावार करता है तो फसल खेतों में ही सड़ जाती है। मजबूर हो कर किसान औने-पौने दाम पर बिचौलियों को उत्पाद बेचता है। बिचौलिए बिना मेहनत किए मालामाल हो रहे हैं। और खून-पसीना एक करके पैदावार बढ़ाने वाला किसान खून के आंसू रो रहा है।
अगर हम भारत की कृषि व्यवस्था पर गौर करें तो पता चलेगा कि 1950-51 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का योगदान 55 फीसदी से ज्यादा था जो अब घट कर महज 15 फीसदी ही रह गया है जबकि खेती पर निर्भर लोगों की तादाद में इस दौरान 3 गुना इजाफा हुआ है। देश केे करीब 6.4 लाख गांवों में बसे 60 करोड़ किसानों में से 28 फीसदी किसानों के पास सिर्फ आधा हेक्टेयर जमीन ही पाई जाती है जबकि देश का औसत जोत 1.3 हेक्टेयर का है। जोत के घटते आकार व उस पर बढ़ती निर्भरता ने हालत को और भी खराब कर दिया है।
गेहूं के प्रति हेक्टेयर उत्पादन मेें विश्व में भारत का 19वां स्थान है। इस पैदावार के लिए भी किसानों को महंगे बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई के लिए ट्यूबवैल, कीटनाशक दवाओं, बिजली, डीजल व ट्रैक्टर वगैरह की जरूरत पड़ती है। खेती से होने वाली कम आय के कारण उसे कृषिगत सुविधाओं व अन्य पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज पर निर्भर रहना पड़ता है।
केंद्र व राज्य सरकारें मिल कर किसानों के लिए सस्ते कर्ज की योजनाएं तो चलाती हैं पर इन योजनाओं का ज्यादातर लाभ केवल बड़े किसानों को पहुंचता है। छोटेे व मंझोले किसान तो खेती व अन्य निजी जरूरतों की पूर्ति के लिए आज भी साहूकारों व सूदखोरों से ऊंची ब्याज दर पर कर्ज लेने को मजबूर हैं जिसे न चुका पाने की हालत में उन्हें आत्महत्या का सहारा लेना पड़ता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश के 93 फीसदी व तमिलनाडु के 85 फीसदी समेत भारत के ज्यादातर राज्यों के 60 फीसदी किसान कर्जदार हैं।
एक तरफ किसानों को रबी की फसलों के बढ़ते सिंचित क्षेत्रों के कारण सिंचाई के साधनों की कमी, नहरों में पानी की किल्लत, डीजल की महंगाई व बिजली की तंगी से बंद पड़े नलकूप रूपी संकटों का सामना करना पड़ता है तो वहीं खरीफ की फसल के समय मानसून की मार झेलनी पड़ती है। लगातार गिरते भूजल स्तर से खेती की यह समस्या और खतरनाक हो चुकी है।
मुद्दा यह है कि दशकों से देश में खेती की यही हालत है। देश में हर साल बड़ी तादाद में किसानों की आत्महत्या के बावजूद न तो सरकारी तंत्र और न ही किसान खुद खेती की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में सुधार ला पाए हैं। भारत में हर साल लाखों किसानों को खेती छोड़ कर शहरों के बाजारों व मंडियों में मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ रहा है। आज सवाल यह है कि किसानों को इन खराब हालात से कैसे बचाया जाए।
इसके लिए जरूरी है कि किसानों को सस्ती दरों पर जैविक व रासायनिक खादें, अच्छे बीज और अच्छे मशीनी उपकरण मुहैय्या कराए जाएं। गांव-कस्बों के पास ही मंडियां बना कर किसानों को फसलों के उचित दाम दिलाए जाएं ताकि किसानों को उनकी मेहनत का सही फल मिल सके। ज्यादा से ज्यादा गोदामों का बंदोबस्त किया जाए व कुदरती आपदाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए नई फसल बीमा योजना बनाई जाए ताकि किसानों की दिक्कतें दूर हो सकें।
नई उन्नत तकनीकों, अच्छे बीजों, कीटनाशकों, खादों व मशीनी उपकरणों वगैरह की जानकारी किसानों तक पहुंचाने के लिए संगोष्ठियों व कृषि मेलों का आयोजन किया जाए। इसके अलावा संचार सेवाओं को सुलभ बनाया जाए ताकि दम तोड़ चुकी हरित क्रांति को फिर से जिंदा किया जा सके। इन सबके अलावा सार्क देशों से आयातित सस्ते पामोलिव तेल पर कर लगा कर भारतीय तिलहन फसलों को चौपट होने से बचाना भी जरूरी है।
सरकारी नीति के शब्दों के आडंबर और योजनाओं को आकर्षक खाके में फंसाने के बजाय किसान को उसी की शैली में मदद पहुंचाने की जरूरत है। वह चाहता है कि खेेत पर जो फसल तैयार हो, उसकी न्यूनतम लागत उसे मिलती रहे। इस स्तर पर वह सुनिश्चित होना चाहता है लेकिन उसे इस स्तर पर भी पक्का भरोसा नहीं मिल रहा है। किसान दलालों की तरह बिना मेहनत किए मोटी रकम हासिल नहीं करना चाहता। वह मात्र आश्वस्त होना चाहता है कि उसके खेत पर जो फसल उगे, वह बरबाद न हो और उसे उसकी मेहनत के बराबर कीमत मिलती रहे।


