
दो रेखा, शिक्षा और परीक्षा
अशोक महिश्वरे
भारतीय संस्कृति में रेखाओं का अनुपम महत्त्व है। गणितशास्त्र रेखाओं के अभाव में अधूरा है। ज्यामिती गणित का एक ऐसा अभिन्न अंग है जो इसे पूर्णता प्रदान करता है। इस विघा के भीतर आपने अनेकानेक रेखाओं को पढ़ा-समझा होगा।
चातुर्युगीन भारतीय संस्कृति मे सभी युगों का अपना महत्त्व है। इन युगों का रेखा से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन चार युगों में से दूसरे और चौथे युग रेखाओं का विशेष महत्त्व है। इन दो युगों की दो रेखाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। त्रोता युग में खींची गई लक्ष्मण रेखा आज भी हमारे साहित्य और संस्कृति में अपना गौरव बढ़ा रही है।
‘लक्ष्मण रेखा’ शब्द युग्म आम बोलचाल मे प्रयुक्त हो रहा है। ‘लक्ष्मण रेखा’ मर्यादा पालन को ध्वनित करती है। वस्तुत: यह रेखा माता सीता की सुरक्षार्थ लक्ष्मणजी द्वारा तीर से खींची गई थी। सीताजी द्वारा रेखा मर्यादा का उल्लंघन संकट का कारण बना। आज भी यह अपने अर्थ की मर्यादा में जी रही है। भले ही सीताजी ने तुरन्त ही इसे लाँघ दिया किन्तु इस कलयुग में भी लक्ष्मण रेखा ने लक्ष्मण रेखा पार नहीं की है।
त्रेतायुग की भाँति कलयुग में भी ऐक रेखा ने अपना स्थान बनाया है। भारत माता रेखाओं की जननी है। दोनों रेखाओं का जन्म श्यामल कोख से ही हुआ। लक्ष्मण रेखा से सैंकड़ों गुणा शक्तिशाली रेखा आज भी हैं। लक्ष्मण रेखा पंचवटी में खींची गई अशासकीय रेखा है किन्तु आज की रेखा हर गांव, हर गली,हर घर और हर आदमी के जीवन में खींची गई शासकीय रेखा है। केशरिया धरा के कण-कण में यह रेखा व्याप्त है। वैज्ञानिक जिस इलेक्ट्रान,न्यूट्रान को खुली आंख से देखने में सक्षम नहीं है, उस पर भी यह रेखा खींच दी गई है। संभवत: गणित के भीतर इस रेखा को यथाशीघ्र स्थान मिलेगा क्योंकि इसके अभाव में गणित का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा।
यह सर्वशक्तिमान कलयुगी रेखा है: ‘गरीबी रेखा ’। इस रेखा ने समूचे भारतीय समाज को दो भागों में विभक्त कर दिया है- गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा से ऊपर। यह रेखा इतनी बलवान है कि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में इसने अपना रंग जमा लिया है। हमारा भारतीय समाज आम और खास में विभक्त है। कुल जनसंख्या का दस प्रतिशत खास और नब्बे प्रतिशत आम लोग हैं। खास समाज के लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र स्वयंभू हैं। आम समाज का 40 प्रतिशत भाग कलयुगी रेखा के भीतर जबकि 50 प्रतिशत बाहर है।
बाहर का समाज भी भीतर प्रवेश पाने को लालायित है। इस रेखा के भीतर जो आ गया, समझ लो उसका भाग्य संवर गया क्योंकि यह रेखा नहीं विधाता है। इस रेखा के भीतर की कुल आबादी में से आधी आबादी घुसपैठियों की है जो इसकी सुपात्र नहीं है जबकि सुपात्रों का छोटा हिस्सा इस रेखा के बाहर है। इस रेखा ने बहुत से सक्षमों पर अक्षमों का मुखौटा चढ़ा दिया है जबकि वास्तविक अक्षमों को बाहर रखकर सक्षम निरूपित कर दिया है।
सबसे चिन्तनीय पहलू यह है कि इसने शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी पैठ जमा ली है। शिक्षा जो कि प्रतिभाओं की सर्जक है, को भी इसने नि:शक्त बना दिया है। इसकी सारी शक्ति छीन ली है। आर. टी. ई. ( शिक्षा का अधिकार अधिनियम ) के नाम पर बी.पी. एल. शिक्षा पद्धति प्रारम्भ हो चुकी है। इस पद्धति में एक ओर जहां शिक्षकों को निराश किया है, वहीं दूसरी ओर विद्यार्थियों को अकर्मण्य बना दिया है। बापू के अनिवार्य शिक्षा की परिकल्पना को विकृत स्वरूप दे दिया गया है। 6 वर्ष की आयु में कक्षा 1 में दाखिला लेकर गायब हो जाने वाला विद्यार्थी जब 14वें वर्ष की आयु में वापस लौटता है, तब हमारा आर. टी. ई. उसे ससम्मान कक्षा 8 उत्तीर्ण होने का प्रमाण-पत्र सौंपकर अपनी सफलता मान इतराता है।
वर्तमान मेें शिक्षा विभाग के भीतर बी.पी. एल. शिक्षा पद्धति प्रचलित है। परीक्षा में 20 से 25 प्रतिशत प्रश्न ऐसे होते हैं जिन्हें 1 मिनट में शिक्षक विभागीय संरक्षण के बीच हल करवा देता है। 10 -15 अंकों का जुगाड़ विद्यार्थियों के लिए बाएं हाथ का खेल होता है। विभागीय संरक्षण में इतनी नकल अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो परिणाम वास्तविक आएगा। वास्तविक परिणाम वह उस्तरा है जो विभागीय प्रमुखों व प्रशासनिक अधिकारियों की नाक काट जाएगा। इन्हें पचासों सवालों के जवाब देने होंगे। सैंकड़ों घुडकियां खानी पड़ेगी। इनकी सेवा पर भी आंच आ सकती है। इस संकट का सर्वोत्तम हल थोड़ी सी नकल।
जिस बी.पी. एल. पद्धति से प्रतिभाएं संरक्षित व संवर्धित हो रही हैं, राष्ट्र के लिए संकट है। समाज में विसंगतियों का तांडव, नैतिक मूल्यों का पतन; भ्रष्टाचार का बोलबाला, आपराधिक वृत्ति में वृद्धि सभी के मूल में यही कारण है। सरकार बी.पी. एल. की संख्या कम करने के लिए अनेकानेक योजनाएं संचालित कर रही है किन्तु संख्या में कोई कमी न होकर वृद्धि ही होना भावी संकट का सूचक है। प्रशासनिक पदों की प्रतिपूर्ति बाबत आयोजित होने वाली परीक्षाएं भी इसी पद्धति पर संचालित हो रही है। जब समूची परीक्षा पद्धति ही बी.पी. एल. है, वहां ए.पी. एल. समाज सृजन की कामना जन्मान्ध की आंखों में हरियाली दर्शन की कामना से अधिक कुछ नहीं है।


