संघ मुक्त भारत के मायने
वीरेंद्र सिंह परिहार
अभी हाल में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संघ मुक्त भारत का नारा दिया है और इसके लिए सभी विरोधी दलों को एक झंडे तले इकट्ठे होने का आह्वान किया है। नीतीश कुमार ने मात्र भाजपा विरोधी दलों को ही इकट्ठा होने का आह्वान नहीं किया है बल्कि भाजपा के सहयोगी दलों जैसे शिवसेना, अकाली दल इत्यादि को भी यह कहते हुए अपने साथ आने को कहा है कि भाजपा उनके साथ उचित व्यवहार नहीं कर रही है।
यह बताना प्रासंगिक होगा कि गत लोकसभा चुनाव के पूर्व नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था क्योंकि मोदी का मानना था कि देश में सभी समस्याओं की जड़ मूलत: कांग्रेस पार्टी है। कुल मिलाकर मोदी का मानना था और है भी, कांग्रेस भ्रष्टाचार, वंशवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और मौकापरस्ती का पर्याय बन चुकी है। नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाकर और कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल कर कांग्रेस मुक्त भारत की दिशा में सार्थक सफलता भी पाई है।
यह उम्मीद करने का पर्याप्त आधार है कि कांग्रेस पार्टी जिस ढंग से मोदी विरोध के नाम पर अलगाववादी एवं राष्ट्र विरोधी तत्वों के साथ गलबहियां मिला रही है तो वह दिन दूर नहीं जब क्रमश: – क्रमश: कांग्रेस मुक्त भारत का नारा पूरी तरह साकार हो सकेगा।
पर उपरोक्त नारे के ठीक उलट नीतीश कुमार जब संघ मुक्त भारत की बात करते हैं तो यह समझे जाने की जरूरत है कि आखिर इसके निहितार्थ क्या हैं? यह बताना प्रासंगिक होगा कि नीतीश कुमार अपने को जय प्रकाश नारायण के अनुयायी कहलाते हैं जिन्होंने कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार और कुशासन के विरुद्ध 1973 से 1975 के मध्य पूरे देश को आंदोलित किया था तथा 1977 में इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन को उखाडऩे के लिए जिस जनता पार्टी का निर्माण किया था उसमें जनसंघ के साथ नीतीश कुमार जैसे लोग भी थे, यानी कि उस दौर में नीतीश कुमार जैसे लोग कांग्रेस मुक्त भारत के पक्षधर थे। इतना ही नहीं 1994 से नीतीश कुमार सतत भाजपा के साथ रहे और उनका यह गठबंधन सितम्बर-2013 में तब टूटा जब मोदी भाजपा की ओर से लोकसभा चुनाव का चेहरा बने।
कहने का आशय यह कि इतने लम्बे राजनीतिक जीवन में यानी कि 1977 से लेकर वर्ष 2013 तक नीतीश कुमार को संघ एवं भाजपा से कोई समस्या या शिकायत नहीं थी, फिर अचानक तीन वर्षों में ही ऐसी कौन सी स्थिति आन पड़ी कि नीतीश कुमार को संघ मुक्त भारत का नारा देना पड़ गया। अभी तक तो लोगों को यही पता था कि नीतीश कुमार को जो भी समस्या है, वह नरेन्द्र मोदी से है। ऐसी स्थिति में क्या यह बेहतर नहीं होता कि नीतीश कुमार मोदी मुक्त भारत का नारा देते।
अधिकांश लोगों को यह पता है कि विगत कई वर्षों से नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा पाले हुए हैं, खासकर जब देश की मुख्य विपक्षी पार्टी एक तरह से पूरी तरह दिशाहीन और सक्षम नेतृत्व के अभाव में दम तोड़ती नजर आ रही हो और अरविंद केजरीवाल की दोहरी नीतियों के चलते उनका पर्दाफाश जैसे हो गया हो तो नीतीश कुमार को लगता है कि भारतीय राजनीति के केन्द्र बिन्दु पर आने के लिए यह बेहतर अवसर है।
यह बात अलग है कि कांग्रेस समेत दूसरे विरोधी दलों ने इस पर किसी भी तरह की उत्साहजनक प्रतिक्रि या नहीं दिखाई। यहां तक कि लालू यादव जैसे नेता ने भी खुलकर इस प्रस्ताव का समर्थन न कर गोल-मोल बातें की। लोगों को यह याद होगा कि बिहार विधानसभा का पिछली चुनाव जीतने के बाद लालू यादव ने कहा था कि नीतीश बिहार संभालेंगे और वह दिल्ली की राजनीति करेंगे पर यहां तो मामला यह है कि नीतीश बिहार तो संभालेंगे ही, दिल्ली की राजनीति भी करेंगे। भला यह बात लालू यादव को कैसे पसंद आती?
रहा सवाल कांग्रेस पार्टी का तो यह तो सभी को पता है कि विपक्षी पार्टियों में एक वही पार्टी है जिसकी उपस्थिति कमोबेश पूरे देश में है। ऐसी स्थिति में वह नीतीश के नेतृत्व को भला क्यों स्वीकार करेगी? दूसरी बड़ी बात यह कि कांग्रेस पार्टी कहने को राजनीतिक दल भले हो पर कुल मिलाकर वर्तमान दौर में वह एक खानदान की प्रापर्टी जैसी है, ऐसी स्थिति में वह खानदान के इतर किसी और को सत्ता के शीर्ष पर बैठाने को कैसे सोच सकती है? हां, रणनीतिक तौर पर किसी देवेगौड़ा या गुजराल को भले बैठा दे या मनमोहन सिंह जैसे किसी व्यक्ति को बैठा दे जिसका रिमोट खानदान के हाथों में हो।
अब रहा सवाल दूसरे क्षत्रपों का तो जयललिता, ममता और नवीन पटनायक जो अपने प्रदेशों में एकाधिकार जैसा रखते हैं, वे भला नीतीश का नेतृत्व क्यों स्वीकारने लगे? बिहार में भी नीतीश से ज्यादा जन समर्थन लालू के पास है, जिसका उदाहरण यह है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों में ही लालू की पार्टी के पास नीतीश की पार्टी से ज्यादा सीटें हैं। ऐसी स्थिति में जब नीतीश बिहार तक में सर्वमान्य नेता नहीं हैं तो फिर प्रधानमंत्री बनने का सपना ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखना’ ही कहा जा सकता है। हां, यदि बिल्ली के भाग्य से छींका फूट जाए तो बात और है।
सबसे बड़ी बात यह कि नीतीश कुमार की इस बात का कि ‘संघ मुक्त भारत’ का सैद्धांतिक आधार क्या है? पहली बात तो यह कि संघ कोई दलगत राजनीति नहीं करता। वह सत्ता की राजनीति नहीं करता। अलबत्ता वह इतनी राजनीति जरूर करता है कि राष्ट्रीय एकता और अखण्डता पर आँच न आने पाए। राष्ट्र की सीमाएं सुरक्षित रहें। राजनीति का लक्ष्य व्यक्ति या दल न होकर राष्ट्र हो। कुल मिलाकर राजनीतिक दलों और नेताओं की राजनीति में राष्ट्र की सर्वोपरिता हो यानी राजनीति राष्ट्र के लिए हो। नागरिकों का एक राष्ट्रीय चरित्र हो और ऊंच-नीच, भेदभाव तथा छुआछूत खत्म होकर सर्वत्र सामाजिक समरसता कायम हो।
व्यवहारिक तौर पर यह एक सच्चाई है कि भाजपा में जो संगठन मंत्री जाते हैं, अमूमन वे संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक होते हैं। उनका लक्ष्य भी संघ को कोई सत्ता पर नियंत्रण न होकर मात्र इतना होता है कि जैसे दूसरे दल किसी खानदान या व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति बन गए हैं, वैसा भाजपा में न हो और उसकी विशिष्ट राष्ट्रवादी विचारधारा साथ ही उसका चरित्र कार्यकर्ता आधारित बना रहे पर नीतीश कुमार जैसे लोगों को ऐसा लगता है कि इस तरह से वह संघ पर हमला करके भाजपा के आधार को तोड़ सकेंगे, ठीक वैसे ही जैसे गत लोकसभा चुनावों के पूर्व बहुत से कांग्रेसी भाजपा या मोदी से लडऩे के बजाय संघ से लडऩे की बातें करते थे। नतीजा सबके सामने है।
जैसा कि सरसंघचालक मोहन भागवत ने उस वक्त कहा था कि ये मोदी व भाजपा से लड़ नहीं सकते, इसलिए संघ से लडऩे की बातें करते हैं। सवाल उठता है कि क्या नीतीश की भी यही स्थिति नहीं? नीतीश कुमार को यह पता होना चाहिए कि संघ को मिटाने, उसे अस्तित्वहीन करने के लिए पता नहीं कितने दुष्प्रचार किए गए। यहां तक कि उसके विरुद्ध दो-दो बार प्रतिबंध भी लगाए गए लेकिन संघ की सेहत पर इसका कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा और आज वह ऐसा विशाल वट वृक्ष बन चुका है जिसकी जड़ें बहुत गहराई तक जा चुकी हैं।
वस्तुत: संघ का विरोध मात्र वोट बैंक की राजनीति और निजी महत्त्वाकांक्षा का परिणाम है। नीतीश भी इससे अछूते नहीं हैं। बेहतर होता कि वह भ्रष्टाचार मुक्त, आतंकवाद मुक्त भारत की बातें करते पर जो लालू यादव की सरपरस्ती स्वीकार चुके हों और वोट राजनीति जिसका एकमेव लक्ष्य हो, उससे ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है?


