
69 वें गणतंत्र दिवस के शुभअवसर पर आज लाल किले की प्राचीर से हमारे प्रधान सेवक द्वारा देश की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मोर्चों पर झंडे गाड़ने के अनेक दावे किए जाएंगे। पर सच तो यह है कि देश का बहुसंख्यक समाज जहाँ हजारों साल पहले था आज भी वहीं है। अगर नीति और नीयति में अपेक्षित बदलाव नहीं लाया गया तो वह समाज कल भी वहीं रहेगा।
द्रष्टव्य हैं निम्न पंक्तियाँ जो हकीकत को कुछ इस प्रकार बयाँ करती हैं:
*ये कैसी आज़ादी है?*
– संकेत यादव
ये कैसी आज़ादी है।
हर तरफ बरबादी है।
ये कैसी आज़ादी है?
भारतवासी पूछ रहा है
ये कैसी आज़ादी है?
जहां भी देखो आँख उठा के
भूखी खड़ी आबादी है।
ये कैसी आज़ादी है?
भ्रष्टाचार में लिप्त देख
अब सिसक रही है खादी
नेताओं ने देश लूट के
किया बहुत बरबादी।
ये कैसी आज़ादी है?
जाति-धर्म के टक्कर में
बन गए है आतंकवादी
लहू-लुहान अब देश कर रहे
मिलकर नक्सलवादी।
ये कैसी आज़ादी है?
खाकी-खादी सब बदनाम
मिलकर काटें चाँदी
आम नागरिक त्रस्त
बन रहे भाग्य-भरोसेवादी।
ये कैसी आज़ादी है?
खुलेआम अब विचर रहे हैं
भ्रष्ट नेता संग अपराधी
घूम-घूमकर कहते न थकते
हम हैं गांधीवादी।
ये कैसी आज़ादी है?
घपलों व घोटालों संग
महँगाई लाई आँधी
भूखे पेट आज भी सो रही
मुल्क की अर्ध आबादी।
ये कैसी आज़ादी है?
पूरा भारत सराबोर अब
मना रहा आज़ादी
भूल गए हम भगत- बोस को
बन गए सुविधावादी।
ये कैसी आज़ादी है?
उठो युवा अब तन-मन- धन से
ला दो क्रांति की आँधी
बचा लो अस्मिता भारत की
अब और न हो बरबादी।
ये कैसी आज़ादी है?
भारतवासी पूछ रहा है
ये कैसी आज़ादी है?
जहां भी देखो आँख उठा के
भूखी खड़ी आबादी है।
ये कैसी आज़ादी है?
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