
लेख़क : रामचन्द्र यादव (संकेत)
जी न्यूज़ हिंदी चैनल पर अपने इंटरव्यूह के दौरान सुधीर चौधरी द्वारा रोजगार के मुद्दे पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में हमारे प्रधान सेवक जी ने बहुत ही बढ़िया जवाब दिया जिसको सुनकर/जानकर हमारे देश के पढ़े-लिखे युवा साथियों ने स्टार्ट अप एंड स्टैंड अप स्किम के अंतर्गत चाय-पकौड़े बेचने का ठेला भी लगाना शुरू कर दिया है!
साहब का जवाब था, रोज़गार के रूप में जी न्यूज़ चैनल की ऑफिस के बाहर “पकौड़े” बेचने का।
मुझसे एक भाई ने कहा, “संकेत जी, इस *पकौड़े बेचने के प्रधान सेवक के बयान* पर आपकी क्या राय है?”
मैंने कहा- इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है दरअसल साहब शिक्षा के वास्तविक स्तर की जानकारी ही तो दे रहे थे! आज जिस तरह की शिक्षा हम दे और ले रहे हैं उसका सीधा सा मतलब ही है *”चाय और पकौड़े बेचना।” शुरुआत तो आखिर यहीं से करनी पड़ेगी भले ही बाद में कुछ और बेचने का मौका मिल जाय!*
वैसे, साहब जी खुद चाय बेचकर इस मुकाम तक पहुँचे हैं।
गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण ने कहा है- हर जीव अपने स्वभाव के वशीभूत ही कर्म करता है और बढ़ा-चढ़ाकर उसका कथन भी करता है।
अगर हमारे साहब जी के स्वभाव में ही कुछ बेचना है तो क्या उनसे और किसी चीज की अपेक्षा की जा सकती है?
सावधान। बेचने वाला कुछ भी बेच सकता है। आज बेचने वाले के हाथ में हमने पूरा देश सौंप दिया है। नतीजे धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। अपने उपरोक्त स्वभावजन्य कर्म का परिचय भी साहब समय-समय पर देते रहे हैं और मौका मिला तो आगे भी देते रहेंगे।
यथा, मैं गुजराती हूँ व्यवसाय मेरे खून में है। लोगों को ईर्ष्या है कि एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री कैसे बन गया?
ये सब चुनाव के दौरान हम साहब की जुबान से टपकते हुए शहद के रूप में देखते और सुनते आ रहे हैं।
मैंने आगे कहा मित्र, साहब का यह बयान उनकी वास्तविक एकेडेमिक डिग्री का खुलासा भी करता है। हाँ, यह बात और है कि साहब की डिग्री माँगते-माँगते अरविंद केजरीवाल की खाँसी ठीक हो गई। लेकिन साहब की डिग्री तब तक सामने नहीं आयी जब तक कि वह खुद आकर उक्त चैनल के माध्यम से आज अपनी डिग्री का खुलासा नहीं कर दिये।
भाई ने दूसरा सवाल दागा, संकेत जी- “भक्तों को तो साहब के हर बयान में गूढ़ार्थ नजर आता है। आपका क्या ख्याल है?”
मैंने कहा- भक्त आख़िर भक्त होते हैं। अगर वे अपने भगवान के दिल की बात न जानें तो वे भक्त किस काम के?
मैं भी पकौड़े के उक्त बयान में उसके गूढ़ार्थ को कुछ समझ पा रहा हूँ, जो यह है-
“भई, पकौड़े खाने के बाद चाय पीने का मजा ही कुछ और होता है! जितने ही पकौड़े लोग खाएंगे उतनी ही ज्यादा चाय भी पियेंगे, लिहाज़ा चाय भी खूब बिकेगी।
युवाओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जितनी चिंता उन्हें उनके रोजगार को लेकर है उससे कहीं ज्यादा चिंता साहब को होगी 2019 के आम चुनाव के बाद के अपने व्यवसाय और रोज़गार को लेकर।
रोजगार के रूप में पकौड़े बेचने का मंत्र साहब ने अपनी बड़ी सूझ-बूझ और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए दिया है।
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