
आसान नहीं है कर प्रबंधन को हल करना
नरेंद्र देवांगन
सफेदपोशों की करतूत है कालाधन। जनकल्याण के लिए जरूरी रकम में से हिस्सा मार लेने की बाजीगरी अब कर प्रबंधन यानी टैक्स मैनेजमेंट कहलाती है। कालाधन भारतीय अर्थव्यवस्था को दीमक के समान चाट रहा है। धन्ना सेठों की तिजोरी से देश-विदेश के बैंकों में बेनामी खातों, प्रॉपर्टी, हवाला और सट्टेबाजी तक में कालेधन का बोलबाला है। काले चोरों के साम्राज्य में सेंध लगाना नामुमकिन ही साबित हुआ है। हाल में पनामा पेपर्स लीक में कुछ भारतीयों के नाम सामने आए हैं। सरकार ने दोषियों पर कार्रवाई का रस्मी बयान दे कर जुबानी जमा खर्च कर दिया है बस।
वैसे भी अब यह कोई राज की बात नहीं रह गई है कि दुनियां में बेमाप काली कमाई मौजूद है और वह सर्वव्यापी है। यह भी जानी-मानी बात है कि यह काली कमाई लगातार अपने लिए किसी सेफ हैवन की तलाश करती रहती है। इस काली कमाई में हर तरह का गैरकानूनी पैसा होता है जैसे टैक्स नहीं चुका कर जमा की गई रकम, घूस, कमीशन, तस्करी का पैसा, ड्रग्स का पैसा वगैरह वगैरह।
इस मायने में पनामा पेपर्स लीक होने का एक खास महत्त्व है क्योंकि ये पेपर्स न केवल फर्जी कंपनियों की पहचान करने में कामयाब रहे बल्कि इन कंपनियों में जिन लोगों का पैसा जमा है, उनके नाम भी वे सार्वजनिक कर पाए। पनामा पेपर्स ने हमें यह भी बता दिया है कि कालेधन की गुत्थी कितनी पेचीदा है और उसका अंदरूनी सच कितना परतदार है।
इसके साथ ही सामने आई टैक्स की गुत्थी को सुलझाना आसान नहीं है लेकिन क्या कर प्रबंधन यानी टैक्स मैनेजमेंट और कर अपवंचना यानी टैक्स इवेजन में मौजूदा कानून भेद कर सकते हैं क्योंकि जहां कर अपवंचना गैर कानूनी है वहीं टैक्स प्रबंधन कानून सम्मत है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अरिजीत पसायत भी इस सवाल को उठा चुके हैं। पनामा पेपर्स में सामने आए नामों को प्रथम दृष्टया लोग कर चोरी में लिप्त मानेंगे लेकिन लोगों की राय और कानूनी पहलू में काफी अंतर होता है। वर्ष 1985 में मैकडॉवेल केस में सुप्रीम कोर्ट ने टैक्स के वैधानिक और कानूनी पहलू में भेद करने का प्रयास किया था।
इंग्लैंड की राजनीतिक व्यवस्था से उपजे वेस्टमिनिस्टर सिद्धांत के तहत टैक्स के बोझ से बचने के लिए हर व्यक्ति कुछ न कुछ जतन करता है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे चिनप्पा रेड्डी ने अपने एक आदेश में कहा था कि वेस्टमिनिस्टर सिद्धांत अब खत्म हो चुका है। रेड्डी के अनुसार अब हम जनकल्याणकारी राज्य में रहते हैं जहां योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय आवश्यकताएं होती हैं। अब कोई भी यह कह कर टैक्स से नहीं बच सकता कि उसने कानूनी रूप से टैक्स से बचने के उपाय किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 के एक चर्चित मामले में देश में निवेश के अनुकूल माहौल बनाए रखने के लिए विधि सम्मतता को गौण रखा था। सरकार ने पनामा पेपर्स लीक के बाद बयानबाजियां तो शुरू की हैं लेकिन खुद सरकार ही पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह कह चुकी है कि वह अन्य देशों से सूचना मांगने अथवा मीडिया रिपोर्टों के आधार पर कार्रवाई करने को बाध्य नहीं है। इसमें दोहरे कराधान की संधि आड़े आती है। दुनिया के नक्शे पर अनजाने से देशों में सबसे सुरक्षित टैक्स तिजोरियां हैं। दुनियाभर के कालेधन के जमाखोरों के इन छोटे-छोटे देशों में बैंक खाते हैं। ये देश अपने टैक्स लॉ को संशोधित करते हैं। इन्हें टैक्स हैवन यानी सुरक्षित पनाहगार कहा जाता है। इनमें पनामा सहित बरमूडा, लक्जमबर्ग, केमन आइलैंड्स, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, डोमेनिका रिपब्लिक शामिल हैं। कर चोर यहां शैल कंपनियां खोल लेते हैं।
कई फर्में बाकायदा ऐसी कंपनियां खोलने के लिए दुनियाभर में अपने एजेंटों को भेजती हैं। ये कंपनियां केवल कागजों में ही होती हैं। काली कमाई को इन कागजी कंपनियों में लगाया जाता है फिर इसमें मुनाफे को संबंधित मालिक के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसी प्रकार मनी लाउन्ड्रिंग के लिए ऑफशोर कंपनियों का भी इस्तेमाल होता है। कुल मिला कर इन देशों की अर्थव्यवस्था इसी काली कमाई को रोटेट करने से होती है। इन देशों की अर्थव्यवस्था को भी लाभ होता है।
आज महज एक क्लिक के चलते पैसे को एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में भेजा लाने लगा है। बहुधा यह काम कानूनी फर्में करती हैं। आज दुनिया के अलग-अलग कोनों में इस तरह की बेतहाशा कानूनी फर्में कुकुरमुत्ते की तरह पनप गई हैं। काली कमाई के खातों के ब्योरे अनेक परतों में अनेक फर्जी पहचानों के साथ छुपे होते हैं, जिन्हें खोज निकालना टेढ़ी खीर होता है।
दुनिया में करीब 60 ऐसे देश हैं, जहां अमीर बिरादरी अपनी पहचान उजागर हुए बिना काली कमाई जमा रख सकती है। इन जगहों में स्विट्जरलैंड, चैनल आइलैंड, लिंचेस्टिन, पनामा आदि शुमार हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्था काले धन पर ही चलती है। बदले में ये कालाधन जमा करने वालों को जिंदगीभर की गोपनीयता प्रदान करते हैं। भारत सरकार की इन देशों के साथ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके तहत भारतीय कालाधन धारकों के नाम बाहर आ सकें। यही वजह है कि कालाधन धारकों ने सरकार को संपत्ति का 60 फीसदी कर देने की बजाय उसे छिपाए रखना ही बेहतर समझा।
जीएफआई के तथ्यों से सामने आया है कि भ्रष्ट नेता, उद्योगपति और अफसर भी बेनामी कंपनियां बना कर, व्यापारी टैक्स में चोरी कर मनी लाउंन्ड्रिग में साजबाज होते हैं। पैसे के इस अवैध लेन-देन का माफिया दुनियाभर में अपनी जड़े जमाए हुए है। इस अवैध कारोबार पर प्रभावी अंकुश के लिए कई स्तरों पर कार्य किए जाने की आवश्यकता है।
सबसे पहले तो अंतर्राष्ट्रीय कर अपवंचना के तरीकों पर लगाम लगाया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि विभिन्न देशों के बीच इस प्रकार की संधियां अमल में लाई जाएं जिससे कालेधन के आदान-प्रदान पर रोक लगे। साथ ही बेनामी शैल कंपनियों की पहचान कर इन्हें समाप्त किया जाए। शैल कंपनियों के माध्यम से कारोबारी अपने कालेधन को छिपाते हैं। कागजों में चलने वाली इन कंपनियों के जरिए फर्जी तरीके से लाभ कमाया जाता है और फिर संबंधित व्यक्ति के खाते में इस लाभ को ट्रांसफर कर दिया जाता है।


